Sunday, August 16, 2015

Mera Desh Mahan – Vyangya Deshbhakti Kavita | Kirtish Shrotriya

भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कन्या भ्रूण हत्या के बीच भी क्यों कहते हैं हम "मेरा देश महान"? सच्चाई और व्यंग्य से भरी एक गहरी देशभक्ति कविता।



100 में से 100 बेईमान, फिर भी मेरा देश महान, 

जानकर भी इन बातों को बने हुए हैं सब अंजान, फिर भी मेरा देश महान।


सहती है हर ज़ुल्म मगर कुछ करती नहीं है ये आवाम, 

कहने को तो 1.25 अरब हैं, अंदर से कोई एक नहीं, 

बड़ी-बड़ी इन कुर्सियों पर बैठा कोई भी नेक नहीं, 

भ्रष्टाचार के नाम पर हमें लूट रहे नेता बेईमान, फिर भी मेरा देश महान, 

100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


आतंकी घटनाओं से दहला है पूरा हिंदुस्तान,

 दिल्ली, मुंबई, या हो पुणे, कुछ भी इनसे बचा नहीं, 

होटल हो, बस या ट्रेन, अब तो कुछ भी सुरक्षित बचा नहीं, 

आए दिन हमारी सीमाओं पर घुसते रहते ये शैतान, 

यह जानकर भी चुप बैठे हैं, तो मेरा देश महान, 1

00 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


गलियों में झाँक कर देखा तो आए हैं कुछ ऐसे परिणाम, 

अब भाई, भाई का रहा नहीं, कभी बहनों की इज़्ज़त लूटी है, 

तू इसलिए चिंता में है कि गर्लफ्रेंड तुझसे रूठी है, 

अपने माँ-बाप की सेवा कर, चुका कुछ उनके एहसान, 

तभी बनेगा देश महान, 100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


कोख में मार बच्चियों को बन बैठे हैं कुछ हैवान, 

तुझे कल्पना और सुनीता का चाँद पर जाना दिखा नहीं, 

जिन्हें सानिया और साइना का चैंपियन बनना दिखा नहीं, 

इतना सब कुछ जानकर भी, जो ले रहे बेटी की जान, 

तो भी मेरा देश महान, 100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


जानकर भी इन बातों को बने हुए हैं सब अंजान, 

फिर भी मेरा देश महान, फिर भी मेरा देश महान, फिर भी मेरा देश महान...!!



                                                                              ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 16, 2015

Farewell – College Life Vidaai Kavita | Kirtish Shrotriya

पहले दिन जो अजनबी थे, आखिरी दिन जान बन गए। कॉलेज की मस्ती, बंक और दोस्ती को याद करती एक भावुक विदाई कविता।



जब 1st ईयर में मिले थे तब अनजान थे जो, 

आज वही एक-दूसरे की जान हो गए..


कभी सोचते थे 4 लेक्चर तो निकलेंगे कैसे, 

ना जाने कब यहाँ 4 साल पूरे हो गए..


सुख-दुख अच्छा-बुरा सभी में रहे थे साथ, 

क्लास में सभी से करते थे मस्ती-मज़ाक..


लड़ते भी झगड़ते भी, दिन यहीं कटते थे, 

लेक्चर से बंक मार के कैंटीन में मिलते थे..


और आज सोचते हैं क्यों हम इतने बड़े हो गए, 

क्यों फ्यूचर की दौड़ में अपनों से दूर हो गए..


और जब आए थे तब कुछ भी नहीं था हमारे हाथ, 

जाते-जाते यादों की बारात ले गए..


आई है घड़ी जिसे विदाई कहते हैं सभी, 

पर अलविदा कहने को दिल नहीं मानता.... 

अलविदा कहने को दिल नहीं मानता..

        

                                ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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