ज़रा सोचिए…
हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,
हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।
कल भी तो हो सकता था ये काम आराम से,
आज ही तलवार सी ये पाबंदी क्यों है।
न कोई यहाँ मरता है, न कोई जी उठता यहाँ,
फिर हर मेल में ऐसी सनसनी क्यों है।
कभी “urgent”, कभी “asap” की आवाज़ें उठती हैं,
हर शब्द में इतनी बेचैनी क्यों है।
निकले थे घर से कि मेहनत से कुछ बन जाएगा,
अब घर से ज़्यादा दफ़्तर में ज़िंदगी क्यों है।
रोटी के लिए निकले थे, सोचा था सुकून भी मिलेगा,
रोटी तो मिलती है… पर मुस्कान गुमशुदा क्यों है।
कहते हैं — “वर्क–लाइफ़ बैलेंस” है दुनिया में,
फिर हर शाम हमारी ही क़ुर्बानी क्यों है।
हम काम करें ताकि थोड़ा जी भी सकें,
फिर काम ही जीने की बंदगी क्यों है।
और आख़िर में बस इतना सा सवाल है साहब—
अगर काम ही सब कुछ है इस दुनिया में,
तो घर, परिवार और मोहब्बत बनी क्यों है?
और काम के पीछे भागते-भागते
ज़िंदगी ही पीछे छूटती क्यों है।
हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,
हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।
~ किर्तिश श्रोत्रिय