धर्म हो या राजनीति, आजकल हर आयोजन शोर से नापा जाने लग है — पर इस शोर में इंसानियत का सुर कहीं दब जाता है। यह गीत किसी एक धर्म या विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि हर उस आवाज़ के ख़िलाफ़ है जो अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों का चैन छीन ले — क्योंकि सच्ची आस्था मौन में भी उतनी ही गहरी होती है।
शोर के बाज़ार में अब आस्था खोने लगी,
चीखते लाउडस्पीकरों में शांति रोने लगी।
धर्म हो या राजनीति, कैसा ये उन्माद है?
जो किसी की साँस छीने, वो कहाँ संवाद है?
बंद करो ये हुड़दंग, बंद करो ये नारा,
शोर नहीं, सुकून माँगे ये शहर हमारा।
काँपती हैं दीवारें जब बजता है ये शोर,
नन्हे से मासूम का दिल धड़कता पुरज़ोर।
बूढ़ी आँखों में बची जो नींद थी वो लुट गई,
दर्द से बेहाल माँ की साँस जैसे घुट गई।
किस ख़ुदा को, किस विधाता को सुनाना चाहते हो?
दूसरों का सुख उजाड़ के क्या पाना चाहते हो?
आस्था तो मौन में भी सुन लिया करती सदा,
फिर ये बहरे ढोल लेकर कौन सी है ये अदा?
चाहे मंदिर, चाहे मस्जिद, चाहे कोई द्वार हो,
आवाज़ बस इतनी रहे जो चारदीवारी न पार हो।
रैलियों के नाम पर जो सड़कों पे कोहराम है,
कुर्सियों की भूख का ये शर्मनाक अंजाम है।
जायज़ है उत्सव, जायज़ है हर आस्था, हर नारा,
पर एक दायरे में गूँजे हर सुर, हर इशारा।
ध्वनि की भी सीमा हो, मर्यादा का ध्यान हो,
नागरिक की ज़िंदगी का कुछ तो अब सम्मान हो।
त्याग दो ये कर्कशता, चेतना को अब जगाओ,
भक्ति और विचार को मन के भीतर ही बसाओ।
क़ानून का चाबुक चले, मिले सज़ा भी पूरी,
जो शोर से छीने चैन और नींद करे अधूरी।
सोचो वो शाम कितनी हसीं और पुरसुकून हो,
जब बिन किसी भी शोर के हर इक दुआ कुबूल हो।
अज़ान की मिठास हो या घंटियों की हो पुकार,
मौन में ही खिल उठेगी भक्ति की ये बहार।
ईश्वर तो बस भाव से ही रीझता संसार में,
खो न जाए आदमी इस शोर के व्यापार में।
आओ मिलकर तय करें अब शांति का किनारा,
शोर थमेगा तभी जब जागेगा शहर हमारा।
~ किर्तिश श्रोत्रिय



