Tuesday, August 25, 2026

Jaruri Hai – Zindagi Par Hindi Nazm | Kirtish Shrotriya

कम्फर्ट ज़ोन और पुरानी यादें सुकून तो बहुत देती हैं, लेकिन वहीं ठहर जाना ज़िंदगी नहीं। कुछ मंज़िलें पाने के लिए कुछ जगहों, कुछ रिश्तों और कुछ एहसासों से निकलना ज़रूरी होता है। अगर आप भी किसी बदलाव के इंतज़ार में हैं, तो शायद ये नज़्म आपके लिए है।


किसी का किसी से मिलना ज़रूरी है, किसी का किसी से बिछड़ना ज़रूरी है,
ज़िंदगी में कहीं तक पहुँचने के लिए, कहीं से निकलना ज़रूरी है।


चाँद की झलक के इंतज़ार में तड़पते, उस बावरे चकोर से पूछो, 

उस मिलन से पहले, चढ़ते सूरज का हर शाम ढलना ज़रूरी है।


एक अरसे से ख़ामोश बैठे, उस मोर को फिर से नचाने के लिए, 

आसमान में इन काली घटाओं का, झूम कर मचलना ज़रूरी है।


ये छोटी-छोटी ठोकरें यूँ ही नहीं लगतीं, ज़िंदगी के इस सफ़र में, 

इसमें हर बार गिरकर टूटना, और टूटकर संभलना ज़रूरी है।


यूँ ही नहीं मिलती पहचान किसी को, इस भीड़ भरे ज़माने में, 

सोने को भी कुंदन बनने ख़ातिर, तपती आग में जलना ज़रूरी है।


ठहर गए एक ही दर्द सीने से लगाकर, तो ज़िंदगी कैसे जियोगे 'श्रोत्रिय'? 

नदियों सा बेबाक बहने को, पुरानी यादों की बर्फ़ का पिघलना ज़रूरी है।


                               

                                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, August 18, 2026

Naya Ishq – Hindi Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

कहते हैं जब किसी से सच्चा इश्क़ होता है, तो सबसे पहले हमारी मुस्कुराहटें ही हमारा राज़ खोल देती हैं। यह ग़ज़ल उसी एहसास का जश्न है, जब किसी के आने से चाँद पहले से ज़्यादा खूबसूरत, और ज़िंदगी पहले से ज़्यादा रोशन लगने लगती है..



ये मेरी आँखों का धोखा है, या तेरा इश्क़ चढ़ने लगा है,
न जाने क्यों ये चाँद... अब पहले से बेहतर लगने लगा है।


अधूरी सी चल रही थी जो कहानी मेरी अब तक,
तेरे आने से उसके मुकम्मल होने का, यक़ीं जगने लगा है।


डगमगा रही थी जो कश्ती मेरे इस सफ़र की,
तुम्हारी आहट से ही... उसे किनारा दिखने लगा है।


एक अरसे से ख़ामोश पड़ा था मेरे सीने में जो,
वो दिल अब तेरे नाम से... फिर धड़कने लगा है।


रोशनी तो पहले भी थी, ज़िंदगी के इन कमरों में,
पर तुम्हारी मौजूदगी से... अब उजालों को मतलब मिलने लगा है।


कल तक बेपरवाह सा फिरता था जो शख़्स ज़माने में,
तेरी फ़िक्र में पड़कर... अब वो भी ख़ुद को बदलने लगा है।


मुस्कुराहट तो वैसे हमेशा से थी 'श्रोत्रिय' के होंठों पर,
पर सच कहूँ... आजकल ये चेहरा कुछ ज़्यादा ही खिलने लगा है।


   

                                                                   ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, August 11, 2026

Aaina – Chupa Hua Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

कभी किसी से इतनी शिद्दत से इश्क़ हुआ है कि नाम छुपाना पड़े, नज़रें चुरानी पड़ें, और पूछे जाने पर भी सीधा जवाब न दे पाएं? यह नज़्म उन्हीं शरारती, अधूरे-से एहसासों की है — जहाँ हर बात कहनी नहीं, बस समझा देनी है। आख़िर में एक आइना है, और उसमें झाँकने वाला हर कोई जान जाएगा जवाब क्या है।


वफ़ा को वफ़ा का पता देना, 

ग़र इश्क़ है किसी से, तो बता देना। 


रोज़ लिखना हथेली पे नाम उसका, 

कोई देखे... कि उससे पहले मिटा देना। 


यूँ चुपके-चुपके करना दीदार उसका, 

वो देखे जो तुम्हें, तो नज़रें हटा देना। 


यूँ ही मत करते रहना तुम पीछा उसका, 

किसी दिन नंबर मिले, तो कॉल लगा देना। 


वो पूछे अगर हाल, कहना इश्क़ में हूँ, 

जो पूछे 'किसके?', तो आइना दिखा देना। 


हाँ किया है 'श्रोत्रिय' ने, बस इश्क़ उससे, 

हुई है गर कोई खता, तो सज़ा देना। 


वफ़ा को वफ़ा का पता देना, 

ग़र इश्क़ है किसी से, तो बता देना।


                                  ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, August 4, 2026

Aakhri Udaan – Hindi Ghazal on Silent Love

क्या मोहब्बत में कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका जवाब देने की नहीं — बस महसूस करने की ज़रूरत होती है? ये ग़ज़ल उन सब के लिए है जो किसी के इंतज़ार में बैठे हैं, और सोचते हैं कि बिना कहे भी सामने वाला सब समझ जाएगा। मैंने भी कुछ ऐसे ही सवाल किए हैं, सुनिएगा कि जवाब में क्या मिलता है— पहचान से लेकर आख़िरी उड़ान तक।



गर कह दूं कि इश्क हुआ है, तो क्या मान लोगे, 

मेरी आँखों में देखोगे उसे, तो क्या पहचान लोगे।


हमने तो सौंप दी, हर धड़कन तुम्हारे हाथ में, 

अब क्या और मेरी वफ़ा का इम्तेहान लोगे?


तुम्हारी एक नज़र ही काफी है क़त्ल करने को,

फिर क्यों पलकें झुका कर यूँ मेरी जान लोगे?


कभी तो बिना कहे भी समझो मेरी खामोशी को, 

या हर बार 'इज़हार' के लिए मेरी ही ज़ुबान लोगे?


दीन, दुनिया, उसूल... सब छोड़ बैठे हैं तेरे इश्क़ में, 

क्या अब इस बंदे का बचा-खुचा ईमान लोगे?


आँसू तो पहले ही दे चुके हो तुम इन आँखों को, 

अब क्या मेरे होंठों की ये बची हुई मुस्कान लोगे?


पंख तो पहले ही कतर चुके हो 'श्रोत्रिय' के तुम, 

क्या अब इस तड़पते परिंदे की आखिरी उड़ान लोगे?


                                   

                                                     ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 28, 2026

Bade Hone Ka Harjana – Dosti Poem | Kirtish Shrotriya

वो आधी रात के फ़ोन कॉल्स, वो बेवजह का पागलपन — क्या उम्र के साथ रिश्ते सच में सिमट कर सिर्फ़ 'Stories' और 'Status' तक रह जाते हैं? बड़े होने की क़ीमत पर एक ईमानदार, दिल को छू लेने वाली स्पोकन वर्ड कविता।



वो आधी रात के 'Midnight Calls' अब नहीं आते,

घर के बाहर वो केक वाले सरप्राइज़ अब नहीं आते।

अज़ीज़-ओ-ख़ास हुआ करते थे जो लोग कभी हमारे,

अब उनके स्टेटस पर मेरे 'Reply' तक नहीं आते।


उम्र बढ़ने लगी, तो लोग बिछड़ने लगते हैं,

सब अपनी-अपनी ज़िंदगी के कामकाज में उलझने लगते हैं।

जो कभी हमारी एक आवाज़ पर दौड़े चले आते थे,

अब वो वक़्त ना होने के नए-नए बहाने गढ़ने लगते हैं।


धीरे-धीरे हर एक मुलाकात अब 'Planned' होने लगती है,

ज़िंदगी 'Screen' के एक छोटे से दायरे में सिमटने लगती है।

ख़ुशियाँ अब महफ़िलों में नहीं, बस 'Stories' पर दिखती हैं,

और दूर से मुबारकबाद देने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है।


ना अब कोई रूबरू होकर गले लगाने आता है,

ना हक़ से कोई गालियों वाला प्यार जताने आता है।

ये दूर बैठकर जो सोशल मीडिया की रस्में निभाते हैं,

सच कहूँ... अब जन्मदिन में वो पहले वाला मज़ा नहीं आता है।


अब ना वो 'Birthday Bumps' बचे हैं, ना वो पार्टियां पुरानी हैं,

बस एक शांत से डिनर में बैठकर, सारी समझदारी दिखानी है।

बहुत याद आता है वो पागलपन, जो दोस्तों के होने से था,

आज समझ आया... कि ये 'Maturity' भी कितनी झूठी कहानी है।


दिल करता है कि काश वो पुराने दिन फिर से लौट आएं,

हम फिर से बेवजह, बेफिक्र होकर मुस्कुराएं।

ये ज़िम्मेदारियों का चश्मा, काश थोड़ी देर को उतर जाए,

यार... क्यूं इतने बड़े हो गए हम? चलो फिर से बच्चे बन जाएं।


                                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 21, 2026

Putra Moh – Parenting Par Vyangya Kavita | Kirtish Shrotriya

हर घर में एक धृतराष्ट्र और एक गांधारी छुपे बैठे हैं — जो अपने बच्चे की हर गलती को नज़रअंदाज़ कर, उसे ही सही ठहरा देते हैं। क्या यही अंधा पुत्र-मोह कल एक नए महाभारत की नींव नहीं रखता? महाभारत के प्रतीकों से आधुनिक parenting पर लिखी गई एक तीखी, सोचने पर मजबूर करने वाली कविता।



हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


एक ही वारिस है घर में, सोने के निवाले खाता है,

शीशा भी वो तोड़ दे गर तो, दोष हवा का आता है।

"मेरा बच्चा गलत नहीं", ये घर-घर की लाचारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


गलती को भी सही बताया, सारे सबक भुला बैठे,

ज़िद को उसकी प्यार समझकर, सिर पर उसे बिठा बैठे।

कल का बालक आज बना है, दुर्योधन अवतारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


स्कूल में टीचर ने जो टोका, तो उनसे ही लड़ बैठे,

"ग़लती औरों की होगी", बस इसी बात पर अड़ बैठे।

शिक्षा के मंदिर में करते, अंधों सी तरफदारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


मेहनत की कोई कद्र नहीं, सब बैठे-बैठे पाना है,

बाप की दौलत के दम पर, बस अपना रौब जमाना है।

बड़ों का कोई मान नहीं है, ये कैसी ज़िम्मेदारी है?

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


सुख-सुविधा के नाम पे तुमने, उसको बस अभिमान दिया,

अच्छी शिक्षा भूल गए, बस दौलत का ही ज्ञान दिया।

कल जब तुमको छोड़ चलेगा, तब रोने की बारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


आंखों पर है पट्टी बाँधी, सच से मुंह को मोड़ लिया,

गलत-सही का हर तराज़ू, अपने हाथों तोड़ दिया।

आज तुम्हारे ही आंगन में, महाभारत की बारी है

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


                                                     ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 14, 2026

Bekhudi – Hindi Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि हम इश्क़ से बच जाएंगे... लेकिन जब ये मर्ज़ लगता है, तो इंसान दर्द में भी मुस्कुराता है। एक ऐसे ही आशिक की दास्तान है मेरी ये गज़ल—'बेख़ुदी'


दिल लगाया, लगा कर चले जा रहे हैं, 

दिल दुखाया, दुखा कर चले जा रहे हैं। 


ये अजब है कि हम इश्क़ करते नहीं थे

अब इश्क़ में चोट खा कर चले जा रहे हैं। 


दिल्लगी की राहों पर कांटे बिछे हैं, 

दर्द में मुस्कुरा कर चले जा रहे हैं। 


दिलबरों से मिले हैं सितम ही सितम जो, 

उन्हें माथे चढ़ा कर चले जा रहे हैं। 


नींद में दिख गया जब से साया है उनका, 

ख़्वाब पलकों पे सजा कर चले जा रहे हैं।


थकते नहीं थे याद कर-करके जिसको, 

उसे दिल से भुला कर चले जा रहे हैं। 


कोई शिकवा नहीं है हमें अब किसी से, 

दिल का बोझा उठाकर चले जा रहे हैं।


इश्क़ की महफ़िलों में मिला क्या है 'श्रोत्रिय', 

अपनी हस्ती मिटा कर चले जा रहे हैं।


                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 7, 2026

Friends for a Season – Rishton Ki Kavita | Kirtish Shrotriya

क्या आपकी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसे चेहरे आए जो कुछ वक़्त के लिए फ़रिश्ता बनकर आए, दर्द बाँटा और फिर ख़ामोशी से रुख़्सत हो गए? यह कविता उन्हीं अनकहे रिश्तों को समर्पित है।


इस जीवन के सफर में बहुत से अनजान लोग मिल जाया करते हैं,

पता ही नहीं चलता कब वो हमारी कहानी के अहम किरदार हो जाया करते हैं।


वो लोग जिन्हें कुछ वक्त पहले तक हम जानते नहीं थे,

वो चेहरे जिन्हें कुछ सालों पहले तक पहचानते नहीं थे।


वो लोग हमारे जीवन में कुछ नए से रंग भर दिया करते हैं,

हमारी हर समस्याओं को हर कर, हमें चिंता-मुक्त कर दिया करते हैं।


वैसे ऊपरवाला जब भी हमारी जिंदगी में कुछ मुश्किलें दिया करता है,

उसके साथ ही वो उन मुश्किलों को आसान करने का हल भी दिया करता है।


कुछ वक्त के लिए ही सही वो एक फ़रिश्ते की तरह हमारी जिंदगी में आते हैं,

हमारे हर दर्द-ओ-ग़म को अपना बना कर, हमें मुस्कुराता छोड़ जाते हैं।


शायद इस सफर में उनका साथ तक़दीर को वही तक मंजूर होता है ,

शायद उनसे मिलना और मिल कर बिछड़ना जीवन का दस्तूर होता है।


अफ़सोस तो है वो लोग आज हमारी ख़ुशियों में हमारे पास नहीं हैं,

उनकी याद ही है अब साथ, वो रूबरू हमारे साथ नहीं हैं।


लेकिन वो लोग हमारे सफर के अहम हिस्से जरूर रहेंगे,

वो साथ रहे या न रहे पर उनके वो हंसते गुदगुदाते किस्से जरूर रहेंगे।


                                                                     ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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