Tuesday, October 27, 2026

Bargad - Pita Par Kavita | Kirtish Shrotriya

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं कि उन पर लिखने बैठो तो लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं। ये कविता मेरे पिता के नाम है, उस बरगद के नाम जिसने अपनी धूप गँवाकर हमें छाया दी। उम्मीद है, इसे पढ़ते हुए आपको भी अपने पिता की याद आएगी।

Bargad - Pita Par Kavita by Kirtish Shrotriya

जब भी कुछ लिखने बैठूँ तो, अल्फ़ाज़ बहुत शरमाते हैं,
बात पिता की जब आती है, सारे लफ़्ज़ थरथराते हैं।
जिस हस्ती के दम पर मुझको, ये ख़ूबसूरत जहान मिला,
उन पर क्या लिख पाऊँ जिनसे, मेरे लफ़्ज़ों को मान मिला।


राजस्थान की तपती माटी, में बसा इक छोटा गाँव था,
सूखे पेड़, झुलसती राहें, और थका हर पाँव था।
उस गाँव से इक लड़का निकला, आँखों में अरमान लिए,
सीने में तूफ़ान छुपाए, बाँहों में आसमान लिए।


फिर मध्य प्रदेश के जावरा में, क़िस्मत ने इक मोड़ लिया,
ब्लैकबोर्ड पर चाक पकड़कर, बच्चों से दिल जोड़ लिया।
घंटों खड़े रहे क्लासों में, हर बच्चे की तक़दीर गढ़ी,
शिक्षक से प्रिंसिपल बनने तक, मेहनत की हर सीढ़ी चढ़ी।
ख़ामोशी से काम किया यूँ, लब पर कोई गिला न था,
जितना उन्होंने दिया सभी को, उतना उनको मिला न था।


घर की चारदीवारी में वो, केवल एक पिता न थे,
चलती-फिरती इक महफ़िल थे, कभी किसी से ख़फ़ा न थे।
कैनवास के हर परदे पर वो, रंगों की बोली पढ़ते थे,
रेडियो की मीठी तानों संग, सुर की ऊँचाई चढ़ते थे।
चाय की चुस्की के संग जब वो, देश-दुनिया की बात बताते थे,
राजनीति के बड़े जानकार भी, सुनकर सिर हिलाते थे।
उनकी रोज़ की बातचीत भी इतनी, मीठी, इतनी प्यारी थी,
सुनकर लगता जैसे लफ़्ज़ों की, महकती फुलवारी थी।


मंच पे जब वो माइक सँभालते, दिग्गज भी सर धुनते थे,
पूरे देश के बड़े कवि भी, ख़ामोशी से सुनते थे।
कभी ठहाकों से महफ़िल में, खिलखिलाहट भर देते थे,
अगली ही पंक्ति में सबकी, आँखें नम कर देते थे।
'मुखौटा' ने आईना दिखाया, 'मेरी उड़ान' ने पंख दिए,
'माँ निरुत्तर है' ने दिल को, जज़्बातों के रंग दिए।
पन्नों के बाज़ार से पहले, वो हर दिल के मीत बने,
अलमारी में सजने से पहले, हर धड़कन के गीत बने।


मगर जो बात नहीं लिखी है, किसी किताब के पन्ने पर,
पिता थके हुए, पर पर्वत जैसे, बोझ उठाए कंधे पर।
सपनों और परिवार में से इक, जब भी चुनने की घड़ी आई,
हँसकर अपने ख़्वाब लुटाए, घर पर कभी न आँच आई।
हमने जो भी माँगा बचपन में, सब हमको मिल जाता था,
कितने ख़्वाब दफ़्न हुए उनके, कौन हमें बतलाता था?
पाँव में कितने छाले थे और, कितनी धूप में चलना था,
फिर भी हमारे सामने आकर, उनको हँसते रहना था!
मुँह से कभी न उफ़ निकली और, माथे पे न शिकन रही,
हम बच्चों की ख़ुशी ही बस, जीवन भर उनकी लगन रही।


हमारी छोटी सी जीत पे उनका, ऐसा गर्व से इतराना,
जैसे सारे जग का तमग़ा, घर की चौखट पर आना।
और कभी जब ठोकर खाई, कोई भारी भूल हुई,
डाँट नहीं, बस कंधे पर इक, थपकी सी महसूस हुई।
प्यार से बोले—"कोई बात नहीं, फिर से हिम्मत दिखलाना,
मैं पीछे हूँ खड़ा तुम्हारे, तुम फिर से लड़कर आना!"


आज जो दुनिया पूछती है, तुम किसकी परछाईं हो,
किसकी नेकी साथ लिए हो, कौन सी दौलत पाई हो?
सीना ठोक के कहता हूँ मैं, सर फ़ख़्र से उठाता हूँ,
जो भी हूँ, मैं उनसे ही हूँ, सबको यही बताता हूँ।
लोग जो पूछें महफ़िल में, तुम इतना सच्चा कैसे लिखते हो,
दर्द भरे लफ़्ज़ों में भी तुम, इतने गहरे कैसे दिखते हो?
मुस्कुराकर कहता हूँ मैं, ये उस बरगद की परछाईं है,
जिसने अपनी धूप गँवाकर, मुझको ये क़लम थमाई है।


आज भी जब कोई शेर नया मैं, काग़ज़ के सीने पर धरता हूँ,
उनकी ही सीख को याद मैं करके, सजदे में आँखें भरता हूँ।
स्याही भले ही मेरी दिखे, पर लहू उन्हीं का बहता है,
मेरे हर अल्फ़ाज़ के पीछे, उनका ही साया रहता है।
मैं तो बस उनकी ही क़लम का, इक आधा-अधूरा मिसरा हूँ,
पूरी ग़ज़ल तो पिता हैं मेरे, मैं शब्द-शब्द सा बिखरा हूँ।


पापा, मुँह से कह नहीं पाया, आज क़लम से कहता हूँ,
आपकी उँगली थामे अब भी, हर मुश्किल में चलता हूँ।
बस इतनी सी दुआ है रब से, जब भी अगला जनम मिले,
आपका ही बेटा बनकर, आपके आँगन फूल खिले।
आप ही मेरा गर्व हैं, आप ही मेरा अभिमान हैं,
मेरे सर का ताज हैं आप, आप ही मेरी पहचान हैं।
हाँ पापा, आप ही मेरी सबसे बड़ी पहचान हैं।


                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, October 20, 2026

Ishq Se Ibadat Tak – Hindi Muktak Mala | Kirtish Shrotriya

कुछ रास्ते मंज़िलों के मोहताज नहीं होते; वहाँ सिर्फ़ दिल से उतरना ही काफ़ी होता है। हार में छुपे जीत के मज़े से लेकर वफ़ा के सजदे तक, चार मुक्तकों में पिरोया हुआ एक रूहानी तराना।

Ishq Se Ibadat Tak Hindi Muktak Mala by Kirtish Shrotriya


दिल की राहों में आकर ज़रा देखिए,
सब से नज़रें चुराकर ज़रा देखिए।
हार में ही छुपा है मज़ा जीत का,
इश्क़ में सब लुटाकर ज़रा देखिए!


राज़ अपने बताकर ज़रा देखिए,
ख़्वाब दिल में सजाकर ज़रा देखिए।
फीकी चाय भी शरबत सी हो जाएगी,
आँख उनसे मिलाकर ज़रा देखिए!


ज़ख़्म अपने छुपाकर ज़रा देखिए,
दर्द में मुस्कुराकर ज़रा देखिए।
ठोकरें खा के भी कैसे जीते हैं लोग—
इश्क़ में चोट खाकर ज़रा देखिए!


दिल में उनको बसाकर ज़रा देखिए,
सोई धड़कन जगाकर ज़रा देखिए।
ज़िंदगी इक इबादत में ढल जाएगी—
सर वफ़ा में झुकाकर ज़रा देखिए!

                 

                   ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, October 13, 2026

Phir Bhi - Muktak Mala | Kirtish Shrotriya

कुछ मोहब्बतें मुकम्मल न होकर भी रूह में ताउम्र ज़िंदा रहती हैं।  यह मुक्तक माला 'फिर भी' उसी बेइंतहा चाहत, इंतज़ार और खामोश वादों की एक भावुक दास्तान है—जहाँ पाने की कोई शर्त नहीं, बस बेपनाह प्यार है।

Phir Bhi — Hindi Mukatakk Mala by Kirtish Shrotriya

बंद आँखों से महफ़िल सजाता हूँ मैं,
हर दुआ में उसी को बुलाता हूँ मैं,
वो हक़ीक़त में मेरी भले हो न हो,
अपने ख़्वाबों में उसको ही पाता हूँ मैं।

जो लिखा भी नहीं वो सुनाता हूँ मैं,
गीत तेरी ही चाहत में गाता हूँ मैं,
हाँ पता है तू मेरी ना होगी मगर,
फिर भी तेरी गली को ही आता हूँ मैं।

मुस्कुराहट का पर्दा चढ़ाता हूँ मैं,
अश्क आँखों के सबसे छुपाता हूँ मैं,
मेरी तक़दीर में जब वो शामिल नहीं,
फिर भी हाथों की रेखा मिलाता हूँ मैं!

एक दिया सा हर शाम में जलाता हूँ मैं,
राह में उसकी, पलकें बिछाता हूँ मैं,
वो न आएगी अब, ये ख़बर है मगर,
फिर भी दहलीज़ पर लौ बढ़ाता हूँ मैं।

सर्द रातों में ख़ुद को जलाता हूँ मैं,
उसकी चाहत में ख़ुद को भुलाता हूँ मैं,
वो किसी और की हो चुकी है तो क्या...
अपने हिस्से का वादा निभाता हूँ मैं!

                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, October 6, 2026

Ram Bhi Main, Ravan Bhi Main – Prem Ke Dwand Par Kavita | Kirtish Shrotriya

हम सब किसी न किसी के लिए राम हैं, और किसी के लिए रावण। प्रेम में अक्सर लोग सिर्फ़ उजाला माँगते हैं, पर जो सच में अपनाता है, वह अँधेरा भी साथ लेता है। यह कविता एक ऐसे प्रेमी की आवाज़ है जो अपनी हर परत के साथ स्वीकार किए जाने की माँग करता है, और अंत में यह भरोसा भी देता है कि अँधेरे के बाद वही रोशनी भी बनेगा।

Ram Bhi Main, Ravan Bhi Main Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya

मैं ही आदि और मैं ही अंत, 

मैं ही भटका हुआ वसंत। 

तुझमें जो उठता है संशय, 

मैं ही उस संशय का निश्चय।


हाँ, मैं ही तेरा राम प्रिये, 

और मैं ही तेरा रावण हूँ!

मैं प्यास जगाता तप्त आषाढ़, 

मैं तृप्त भिगोता सावन हूँ।


मुझमें गंगा का शीतल सार, 

मुझमें ही ज्वाला का अंगार। 

जिस पाषाण को तूने पूजा, 

उस मूरत के प्राण भी मैं, 

जिसने तेरी आत्मा बींधी, 

उस प्रत्यंचा का बाण भी मैं।


तू सुर की देवी बन बैठी, 

मैं उसका बिखरा सरगम हूँ, 

मत खोज मुझे तू एक छोर, 

मैं दोनों तट का संगम हूँ। 


पुण्य जगे तो कौशल्या-नंदन, 

क्रोध उठे तो लंका का क्रंदन।

मैं छल भी हूँ, मैं सत्य भी हूँ, 

अधरों पर मौन, मैं कथ्य भी हूँ। 

मैं उत्तर, मैं प्रतिवाद भी हूँ, 

ख़ामोशी का मैं अनुवाद भी हूँ।


छोड़ सभी असमंजस अपने, आ मेरे दोनों रूप समेट, 

फूलों का ही मोह न रख तू, काँटों की भी सेज लपेट। 

मुझसे ही तेरी हर सुबह, 

मुझसे ही हर शाम प्रिये,

मैं ही तेरी पहली मंज़िल, 

मैं ही अंतिम धाम प्रिये!


                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, September 29, 2026

Wo Kunwaare Din – Beparvaah Zindagi Ki Yaadein | Kirtish Shrotriya

कभी ज़िंदगी में एक ऐसा भी दौर था जब न घड़ी की फिकर थी, न कल की — बस अपनी मर्ज़ी और आधी रात की मैगी थी। ये गीत उन्हीं बेफ़िक्र कुँवारे दिनों की एक याद है, जो अब ज़िम्मेदारियों की भीड़ में कभी-कभार ही लौट कर आती है।

बेफ़िक्री का ताज — Kirtish Shrotriya की हिंदी कविता, जिसमें कुंआरे दिनों की आज़ादी, दोस्ती, मैगी और पुरानी यादों को दर्शाया गया है।

ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


एक कुर्सी पे हफ़्तों से कपड़े पड़े, हम नहाने के मुद्दे पे खुद से अड़े।

ना सलीके की कोई भी ज़ंजीर थी, अपनी मर्ज़ी के हम बादशाह बड़े।

दोपहरी तलक आँख खुलती न थी, बस अँधेरे में बजता वो एक साज़ था

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


जेब में चंद सिक्के भले ही रहे, पर हवाओं पे अपनी सवारी रही।

चाय की गुमटियों पे वो गपशप चली, दोस्तों में भी चलती उधारी रही।

कोई मंज़िल नहीं, बस सफ़र चाहिए, हर रास्ते पे अपना ही राज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


रात के दो बजे जब भी भूख लगी, गैस चूल्हे पे मैगी पकाया किए।

कल की चिंता को चादर में अपनी लपेटे, बेवजह ही ठहाके लगाया किए।

ना कमाने की फ़िकर, ना घर का तनाव, हर दिन जैसे अपना ही आग़ाज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


बिस्तर अब तो सलीके से सजने लगे, अब करीने से जीने की आदत लगी।

वो जो बिखरा-सा लड़का था, गुम हो गया, ज़िम्मेदारियों की अब तो चाहत जगी।

याद आती है फिर भी वो आवारगी, वो अपना पुराना-सा अंदाज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी...सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


                                                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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