कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस बार-बार टूटने का वादा करते रहते हैं। यह कविता उसी चक्र की है — जहाँ भरोसा हर बार बिखरता है, और हर बार वही आवाज़, वही फ़रेब उसे फिर से समेट ले जाता है। न पूरा छूटना नसीब है, न पूरा अपनाना — बीच में बस एक गाँठ रह जाती है, जो न खुलती है, न मिटती है। यह उसी अनकही गाँठ की कहानी है।
बड़ी मुश्किल से इन बिखरे हुए जज़्बातों को मैंने संभाला था,
तेरे दिए हर दर्द को चुन-चुन कर, अपनी यादों से निकाला था।
तय कर लिया था अब मुड़कर, तेरी गलियों में नहीं जाऊंगी,
पर क्या पता था कि मैं फिर से, तेरे मीठे फरेब में फँस जाऊंगी।
अंधेरी रात में जब उसके नाम से स्क्रीन जगमगाती है,
बड़ी मुश्किल से संभाली हर बात, फिर पल में बिखर जाती है।
काँपते हुए हाथों से मैं फिर उसका फ़ोन उठा लेती हूँ,
और अपनी हर कसम को फिर, इक पल में मिटा देती हूँ।
वो लौट आता है ये कहकर, कि अबके शिकायत का मौका नहीं दूँगा,
"बस इस बार भरोसा कर ले, आगे से कभी धोखा नहीं दूँगा।
बहुत ज़रूरत है तेरी, मेरी इस आखिरी आरज़ू को मान ले,
तेरे सिवा कोई नहीं है मेरा, तू इस हकीकत को जान ले।"
कहता है, "गर तूने भी ठुकराया, तो मैं कहीं का न रहूँगा"
"तूने भी साथ छोड़ा अगर, तो इस दर्द को जा कर मैं किसे कहूँगा?"
अपनी इन्हीं मजबूरियों के जाल में, वो मुझे फिर फँसा देता है,
और अपनी ज़रूरत पूरी होते ही, हर बार की तरह मुझे भुला देता है।
उसे भूलने की मेरी हर कोशिश, वो एक पल में बेकार कर जाता है,
अपनी फुरसत में लौट कर, मेरी शांत ज़िंदगी में शोर भर जाता है।
हैरानी है कि इन सब के बाद भी, उसे छोड़ने को दिल करता नहीं है,
लाख जतन करूँ पर उसके लिए, मेरा ये इश्क मरता नहीं है।
दिल आज भी कहता है कि शायद, हमारे इश्क को किसी की नज़र लगी है,
इसे दुनिया से बचा लेने की, मेरे अंदर आज भी एक आस जगी है।
पर भरोसे की नाज़ुक सी डोर, एक बार टूटे तो कहाँ जुड़ पाती है?
और अगर लाख जतन से जोड़ भी लो, तो एक गाँठ ज़रूर रह ही जाती है।
वो गाँठ, जो चुभती है रोज़, पर धागे को टूटने नहीं देती,
अंदर ही अंदर रुलाती है, पर खुलकर रोने नहीं देती।
ये कैसी कैद है उसकी यादों की, जो चैन से सोने नहीं देती है,
न वो खुद मेरा होता है, न मुझे किसी और का होने देती है।
~ किर्तिश श्रोत्रिय






