कभी ज़िंदगी में एक ऐसा भी दौर था जब न घड़ी की फिकर थी, न कल की — बस अपनी मर्ज़ी और आधी रात की मैगी थी। ये गीत उन्हीं बेफ़िक्र कुँवारे दिनों की एक याद है, जो अब ज़िम्मेदारियों की भीड़ में कभी-कभार ही लौट कर आती है।
ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
एक कुर्सी पे हफ़्तों से कपड़े पड़े, हम नहाने के मुद्दे पे खुद से अड़े।
ना सलीके की कोई भी ज़ंजीर थी, अपनी मर्ज़ी के हम बादशाह बड़े।
दोपहरी तलक आँख खुलती न थी, बस अँधेरे में बजता वो एक साज़ था
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
जेब में चंद सिक्के भले ही रहे, पर हवाओं पे अपनी सवारी रही।
चाय की गुमटियों पे वो गपशप चली, दोस्तों में भी चलती उधारी रही।
कोई मंज़िल नहीं, बस सफ़र चाहिए, हर रास्ते पे अपना ही राज़ था।
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
रात के दो बजे जब भी भूख लगी, गैस चूल्हे पे मैगी पकाया किए।
कल की चिंता को चादर में अपनी लपेटे, बेवजह ही ठहाके लगाया किए।
ना कमाने की फ़िकर, ना घर का तनाव, हर दिन जैसे अपना ही आग़ाज़ था।
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
बिस्तर अब तो सलीके से सजने लगे, अब करीने से जीने की आदत लगी।
वो जो बिखरा-सा लड़का था, गुम हो गया, ज़िम्मेदारियों की अब तो चाहत जगी।
याद आती है फिर भी वो आवारगी, वो अपना पुराना-सा अंदाज़ था।
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।
वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी...सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।
~ किर्तिश श्रोत्रिय






