Tuesday, July 28, 2026

Bade Hone Ka Harjana

वो आधी रात के फ़ोन कॉल्स, वो बेवजह का पागलपन — क्या उम्र के साथ रिश्ते सच में सिमट कर सिर्फ़ 'Stories' और 'Status' तक रह जाते हैं? बड़े होने की क़ीमत पर एक ईमानदार, दिल को छू लेने वाली स्पोकन वर्ड कविता।



वो आधी रात के 'Midnight Calls' अब नहीं आते,

घर के बाहर वो केक वाले सरप्राइज़ अब नहीं आते।

अज़ीज़-ओ-ख़ास हुआ करते थे जो लोग कभी हमारे,

अब उनके स्टेटस पर मेरे 'Reply' तक नहीं आते।


उम्र बढ़ने लगी, तो लोग बिछड़ने लगते हैं,

सब अपनी-अपनी ज़िंदगी के कामकाज में उलझने लगते हैं।

जो कभी हमारी एक आवाज़ पर दौड़े चले आते थे,

अब वो वक़्त ना होने के नए-नए बहाने गढ़ने लगते हैं।


धीरे-धीरे हर एक मुलाकात अब 'Planned' होने लगती है,

ज़िंदगी 'Screen' के एक छोटे से दायरे में सिमटने लगती है।

ख़ुशियाँ अब महफ़िलों में नहीं, बस 'Stories' पर दिखती हैं,

और दूर से मुबारकबाद देने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है।


ना अब कोई रूबरू होकर गले लगाने आता है,

ना हक़ से कोई गालियों वाला प्यार जताने आता है।

ये दूर बैठकर जो सोशल मीडिया की रस्में निभाते हैं,

सच कहूँ... अब जन्मदिन में वो पहले वाला मज़ा नहीं आता है।


अब ना वो 'Birthday Bumps' बचे हैं, ना वो पार्टियां पुरानी हैं,

बस एक शांत से डिनर में बैठकर, सारी समझदारी दिखानी है।

बहुत याद आता है वो पागलपन, जो दोस्तों के होने से था,

आज समझ आया... कि ये 'Maturity' भी कितनी झूठी कहानी है।


दिल करता है कि काश वो पुराने दिन फिर से लौट आएं,

हम फिर से बेवजह, बेफिक्र होकर मुस्कुराएं।

ये ज़िम्मेदारियों का चश्मा, काश थोड़ी देर को उतर जाए,

यार... क्यूं इतने बड़े हो गए हम? चलो फिर से बच्चे बन जाएं।


                                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 21, 2026

Putra Moh

हर घर में एक धृतराष्ट्र और एक गांधारी छुपे बैठे हैं — जो अपने बच्चे की हर गलती को नज़रअंदाज़ कर, उसे ही सही ठहरा देते हैं। क्या यही अंधा पुत्र-मोह कल एक नए महाभारत की नींव नहीं रखता? महाभारत के प्रतीकों से आधुनिक parenting पर लिखी गई एक तीखी, सोचने पर मजबूर करने वाली कविता।



हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


एक ही वारिस है घर में, सोने के निवाले खाता है,

शीशा भी वो तोड़ दे गर तो, दोष हवा का आता है।

"मेरा बच्चा गलत नहीं", ये घर-घर की लाचारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


गलती को भी सही बताया, सारे सबक भुला बैठे,

ज़िद को उसकी प्यार समझकर, सिर पर उसे बिठा बैठे।

कल का बालक आज बना है, दुर्योधन अवतारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


स्कूल में टीचर ने जो टोका, तो उनसे ही लड़ बैठे,

"ग़लती औरों की होगी", बस इसी बात पर अड़ बैठे।

शिक्षा के मंदिर में करते, अंधों सी तरफदारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


मेहनत की कोई कद्र नहीं, सब बैठे-बैठे पाना है,

बाप की दौलत के दम पर, बस अपना रौब जमाना है।

बड़ों का कोई मान नहीं है, ये कैसी ज़िम्मेदारी है?

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


सुख-सुविधा के नाम पे तुमने, उसको बस अभिमान दिया,

अच्छी शिक्षा भूल गए, बस दौलत का ही ज्ञान दिया।

कल जब तुमको छोड़ चलेगा, तब रोने की बारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


आंखों पर है पट्टी बाँधी, सच से मुंह को मोड़ लिया,

गलत-सही का हर तराज़ू, अपने हाथों तोड़ दिया।

आज तुम्हारे ही आंगन में, महाभारत की बारी है

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


                                                     ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 14, 2026

Bekhudi

हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि हम इश्क़ से बच जाएंगे... लेकिन जब ये मर्ज़ लगता है, तो इंसान दर्द में भी मुस्कुराता है। एक ऐसे ही आशिक की दास्तान है मेरी ये गज़ल—'बेख़ुदी'


दिल लगाया, लगा कर चले जा रहे हैं, 

दिल दुखाया, दुखा कर चले जा रहे हैं। 


ये अजब है कि हम इश्क़ करते नहीं थे

अब इश्क़ में चोट खा कर चले जा रहे हैं। 


दिल्लगी की राहों पर कांटे बिछे हैं, 

दर्द में मुस्कुरा कर चले जा रहे हैं। 


दिलबरों से मिले हैं सितम ही सितम जो, 

उन्हें माथे चढ़ा कर चले जा रहे हैं। 


नींद में दिख गया जब से साया है उनका, 

ख़्वाब पलकों पे सजा कर चले जा रहे हैं।


थकते नहीं थे याद कर-करके जिसको, 

उसे दिल से भुला कर चले जा रहे हैं। 


कोई शिकवा नहीं है हमें अब किसी से, 

दिल का बोझा उठाकर चले जा रहे हैं।


इश्क़ की महफ़िलों में मिला क्या है 'श्रोत्रिय', 

अपनी हस्ती मिटा कर चले जा रहे हैं।


                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 7, 2026

Friends for a Season

क्या आपकी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसे चेहरे आए जो कुछ वक़्त के लिए फ़रिश्ता बनकर आए, दर्द बाँटा और फिर ख़ामोशी से रुख़्सत हो गए? यह कविता उन्हीं अनकहे रिश्तों को समर्पित है।


इस जीवन के सफर में बहुत से अनजान लोग मिल जाया करते हैं,

पता ही नहीं चलता कब वो हमारी कहानी के अहम किरदार हो जाया करते हैं।


वो लोग जिन्हें कुछ वक्त पहले तक हम जानते नहीं थे,

वो चेहरे जिन्हें कुछ सालों पहले तक पहचानते नहीं थे।


वो लोग हमारे जीवन में कुछ नए से रंग भर दिया करते हैं,

हमारी हर समस्याओं को हर कर, हमें चिंता-मुक्त कर दिया करते हैं।


वैसे ऊपरवाला जब भी हमारी जिंदगी में कुछ मुश्किलें दिया करता है,

उसके साथ ही वो उन मुश्किलों को आसान करने का हल भी दिया करता है।


कुछ वक्त के लिए ही सही वो एक फ़रिश्ते की तरह हमारी जिंदगी में आते हैं,

हमारे हर दर्द-ओ-ग़म को अपना बना कर, हमें मुस्कुराता छोड़ जाते हैं।


शायद इस सफर में उनका साथ तक़दीर को वही तक मंजूर होता है ,

शायद उनसे मिलना और मिल कर बिछड़ना जीवन का दस्तूर होता है।


अफ़सोस तो है वो लोग आज हमारी ख़ुशियों में हमारे पास नहीं हैं,

उनकी याद ही है अब साथ, वो रूबरू हमारे साथ नहीं हैं।


लेकिन वो लोग हमारे सफर के अहम हिस्से जरूर रहेंगे,

वो साथ रहे या न रहे पर उनके वो हंसते गुदगुदाते किस्से जरूर रहेंगे।


                                                                              ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 30, 2026

Khairiyat

कब आख़िरी बार आपने किसी अपने से बस यूँ ही, बिना किसी वजह के, उसका हाल पूछा था? इस भागदौड़ में हम अपनों को ही भूलते जा रहे हैं — यह कविता उसी अफ़सोस की आवाज़ है।


बड़े दिनों से बात नहीं हुई, दोस्त,
तो सोचा तुम्हारा हाल पूछ लूँ।
कैसे हो, किस हाल में हो,
बस इतना-सा सवाल पूछ लूँ।


सोचा आज इस भागदौड़ के दौर में,
तुमसे तुम्हारी खैरियत पूछी जाए,
तुम्हारे मम्मी-पापा, भाई-बहन,
परिवार की भी तबीयत पूछी जाए।


इतने दिनों से मुलाक़ात नहीं हुई,
तो सोचा, अपनी आवाज़ ही तुम्हें सुना देता हूँ,
तुमने तो याद किया नहीं,
पर मैं ही सही, तुम्हें अपनी याद दिला देता हूँ।


ज़्यादा नहीं, बस इतना कहूँगा,
कि कभी तुम भी अपनी आवाज़ सुना देते।
मिल जाता अगर वक़्त किसी दिन,
तो एक फ़ोन ही सही हमें लगा देते।


अब अगर कहो कि वक़्त ही नहीं था तुम्हें,
तो मुझे हैरत भी नहीं होगी।
जानता हूँ मैं  इन उलझनों में,
शायद तुम्हें भी फुर्सत नहीं होगी।


ख़ैर छोड़ो… कहाँ इन गंभीर बातों में वक़्त गँवाना,
ज़िंदगी छोटी है दोस्त, कहाँ इन बातों का बोझ उठाना।


यह सोचकर कि कर लेंगे बात किसी और दिन,
अभी कौन-सी जल्दी पड़ी है।

तुम्हें लगता ज़रूर है कि वक़्त बहुत है,
अभी ज़िंदगी बहुत बड़ी है।


मगर किसे पता फिर उस आवाज़ को
कभी सुन पाने का दोबारा मौका मिले या न मिले,
उस बीते हुए लम्हे में जाने का
झरोखा भी मिले या न मिले।


पर ऐ दोस्त, इस आपाधापी में क्या भरोसा,
कब कौन-सा शख़्स कहाँ गुमनाम हो जाए।
और याद कर लेना अपने अपनों को,
इससे पहले कि ज़िंदगी की आख़िरी शाम हो जाए…


                                                ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 23, 2026

Jaruri To Nahi

जिससे प्यार करें, वो भी उतना ही प्यार करे — क्या यह ज़रूरी है? इस ग़ज़ल में एकतरफ़ा मोहब्बत के दर्द को बड़ी नज़ाकत से बयां किया गया है।


मैं जिससे इश्क़ करूँ, वो मुझसे इश्क़ करे, ये जरूरी तो नहीं।

उसके ख़्वाबों में हो मेरा भी रह-बसर, ये जरूरी तो नहीं॥


मैंने चाहा उसे इतना, दीवानगी की हद तक।

मेरी चाहत का हो उस पर असर, ये जरूरी तो नहीं॥


उसके हर एक लम्हे, हर एक घड़ी का हिसाब रखा मैंने।

मगर उसे भी हो मेरी खैरों-ख़बर, ये जरूरी तो नहीं॥


कुछ देर उसे गर न देखता, तो तलब सी लग जाती थी।

मैं भी उसे इस क़दर ज़रूरी हूँ, ये ज़रूरी तो नहीं॥


वो मिल जाता इस सफ़र में, तो और ही बात थी।

उसी पर आकर थमे ज़िंदगी की डगर, ये ज़रूरी तो नहीं॥


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 16, 2026

Aur kitna batega Hindustan

जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बँटता हुआ देश आख़िर कब तक यूँ ही लहूलुहान होता रहेगा? यह ओजस्वी कविता सत्ता की राजनीति पर एक सीधा और तीखा सवाल है।



रो-रोकर हर सिसकी में, अब एक ही प्रश्न महान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बाँटने चले अपना ईमान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?


नफ़रत की आग में जलने की, अब भाषा की बारी है, 

सज्जन सारे मौन खड़े हैं, दुर्जन की तैयारी है। 

कहीं भाषा, कहीं मज़हब, कहीं जाति का धंधा है, 

ये देशभक्ति नहीं साहब, ये कुर्सी का हथकंडा है!

चमकाने को अपनी किस्मत, घर में आग लगाते हैं, 

ये कुर्सी के भूखे भेड़िये, देश को रोज डराते हैं।


भाई को भाई से लड़वाकर, अपनी महफ़िल सजवातें हैं,

ये भाषा के नाम पर देखो, नफरत का ज़हर उगाते हैं। 

कहीं मराठी, कहीं कन्नड़ का, ये कैसा शोर मचाते हैं? 

जनता सड़कों पर लड़ती है, ये सत्ता के सुख पाते हैं।


जिस थाली में खाते हैं ये, उसी में छेद ये करते हैं, 

बिन पेंदे के लोटे बनकर, पाले रोज बदलते हैं। 

बाहर के दुश्मन से लड़ना, तो फिर भी आसान यहाँ, 

पर घर के भीतर बैठे इन, भेड़ियों का क्या काम यहाँ?

 

जल रहा बंगाल आज क्यों, दिल्ली मौन खड़ी क्यों है? 

सत्ता की ये भूख बताओ, देश से इतनी बड़ी क्यों है?

क्या संसद तब जागेगी जब, सड़कों पर खून बहेगा? 

क्या लाशों के ढेरों पर ही, ये सिंहासन टिका रहेगा?


खालिस्तान के नाम पर जो, साज़िश गहरी जारी है,

'चिकन-नेक' को काटने की, गद्दारों की तैयारी है। 

हे रक्षक! तुम मौन रहे तो, जयद्रथ जीत ही जायेंगे, 

इन शकुनि की चालों पर हम, अपना सर्वस्व: गँवाएंगे।


तुमसे ही उम्मीद लगायी, तुमको ही विश्वास दिया, 

पर तुमने ही सरेआम अब, अपनों को निराश किया।

मगर अफसोस! आज अपनों का ही, लहू सड़कों पे बहता है, 

वो रक्षक खामोश क्यों है, जो हरदम 'शक्ति' कहता है? 

गर घर के भेड़िये न कुचले, तो इतिहास क्या बोलेगा? 

जब आने वाली नस्लों का, हर बच्चा मुँह खोलेगा।


लीच बने ये सत्ताधारी, जन-जन का खून चूसते हैं, 

मतलब की रोटी सेंकने को, घर में लपटें फूँकते हैं। 

अब तो जागो देशवासियों, वरना कल पछताओगे, 

टुकड़े-टुकड़े होकर अपनी, अस्मत भी खो जाओगे।


रो-रोकर हर सिसकी में, अब एक ही प्रश्न महान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बाँटने चले अपना ईमान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?



                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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