कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं कि उन पर लिखने बैठो तो लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं। ये कविता मेरे पिता के नाम है, उस बरगद के नाम जिसने अपनी धूप गँवाकर हमें छाया दी। उम्मीद है, इसे पढ़ते हुए आपको भी अपने पिता की याद आएगी।
जब भी कुछ लिखने बैठूँ तो, अल्फ़ाज़ बहुत शरमाते हैं,
बात पिता की जब आती है, सारे लफ़्ज़ थरथराते हैं।
जिस हस्ती के दम पर मुझको, ये ख़ूबसूरत जहान मिला,
उन पर क्या लिख पाऊँ जिनसे, मेरे लफ़्ज़ों को मान मिला।
राजस्थान की तपती माटी, में बसा इक छोटा गाँव था,
सूखे पेड़, झुलसती राहें, और थका हर पाँव था।
उस गाँव से इक लड़का निकला, आँखों में अरमान लिए,
सीने में तूफ़ान छुपाए, बाँहों में आसमान लिए।
फिर मध्य प्रदेश के जावरा में, क़िस्मत ने इक मोड़ लिया,
ब्लैकबोर्ड पर चाक पकड़कर, बच्चों से दिल जोड़ लिया।
घंटों खड़े रहे क्लासों में, हर बच्चे की तक़दीर गढ़ी,
शिक्षक से प्रिंसिपल बनने तक, मेहनत की हर सीढ़ी चढ़ी।
ख़ामोशी से काम किया यूँ, लब पर कोई गिला न था,
जितना उन्होंने दिया सभी को, उतना उनको मिला न था।
घर की चारदीवारी में वो, केवल एक पिता न थे,
चलती-फिरती इक महफ़िल थे, कभी किसी से ख़फ़ा न थे।
कैनवास के हर परदे पर वो, रंगों की बोली पढ़ते थे,
रेडियो की मीठी तानों संग, सुर की ऊँचाई चढ़ते थे।
चाय की चुस्की के संग जब वो, देश-दुनिया की बात बताते थे,
राजनीति के बड़े जानकार भी, सुनकर सिर हिलाते थे।
उनकी रोज़ की बातचीत भी इतनी, मीठी, इतनी प्यारी थी,
सुनकर लगता जैसे लफ़्ज़ों की, महकती फुलवारी थी।
मंच पे जब वो माइक सँभालते, दिग्गज भी सर धुनते थे,
पूरे देश के बड़े कवि भी, ख़ामोशी से सुनते थे।
कभी ठहाकों से महफ़िल में, खिलखिलाहट भर देते थे,
अगली ही पंक्ति में सबकी, आँखें नम कर देते थे।
'मुखौटा' ने आईना दिखाया, 'मेरी उड़ान' ने पंख दिए,
'माँ निरुत्तर है' ने दिल को, जज़्बातों के रंग दिए।
पन्नों के बाज़ार से पहले, वो हर दिल के मीत बने,
अलमारी में सजने से पहले, हर धड़कन के गीत बने।
मगर जो बात नहीं लिखी है, किसी किताब के पन्ने पर,
पिता थके हुए, पर पर्वत जैसे, बोझ उठाए कंधे पर।
सपनों और परिवार में से इक, जब भी चुनने की घड़ी आई,
हँसकर अपने ख़्वाब लुटाए, घर पर कभी न आँच आई।
हमने जो भी माँगा बचपन में, सब हमको मिल जाता था,
कितने ख़्वाब दफ़्न हुए उनके, कौन हमें बतलाता था?
पाँव में कितने छाले थे और, कितनी धूप में चलना था,
फिर भी हमारे सामने आकर, उनको हँसते रहना था!
मुँह से कभी न उफ़ निकली और, माथे पे न शिकन रही,
हम बच्चों की ख़ुशी ही बस, जीवन भर उनकी लगन रही।
हमारी छोटी सी जीत पे उनका, ऐसा गर्व से इतराना,
जैसे सारे जग का तमग़ा, घर की चौखट पर आना।
और कभी जब ठोकर खाई, कोई भारी भूल हुई,
डाँट नहीं, बस कंधे पर इक, थपकी सी महसूस हुई।
प्यार से बोले—"कोई बात नहीं, फिर से हिम्मत दिखलाना,
मैं पीछे हूँ खड़ा तुम्हारे, तुम फिर से लड़कर आना!"
आज जो दुनिया पूछती है, तुम किसकी परछाईं हो,
किसकी नेकी साथ लिए हो, कौन सी दौलत पाई हो?
सीना ठोक के कहता हूँ मैं, सर फ़ख़्र से उठाता हूँ,
जो भी हूँ, मैं उनसे ही हूँ, सबको यही बताता हूँ।
लोग जो पूछें महफ़िल में, तुम इतना सच्चा कैसे लिखते हो,
दर्द भरे लफ़्ज़ों में भी तुम, इतने गहरे कैसे दिखते हो?
मुस्कुराकर कहता हूँ मैं, ये उस बरगद की परछाईं है,
जिसने अपनी धूप गँवाकर, मुझको ये क़लम थमाई है।
आज भी जब कोई शेर नया मैं, काग़ज़ के सीने पर धरता हूँ,
उनकी ही सीख को याद मैं करके, सजदे में आँखें भरता हूँ।
स्याही भले ही मेरी दिखे, पर लहू उन्हीं का बहता है,
मेरे हर अल्फ़ाज़ के पीछे, उनका ही साया रहता है।
मैं तो बस उनकी ही क़लम का, इक आधा-अधूरा मिसरा हूँ,
पूरी ग़ज़ल तो पिता हैं मेरे, मैं शब्द-शब्द सा बिखरा हूँ।
पापा, मुँह से कह नहीं पाया, आज क़लम से कहता हूँ,
आपकी उँगली थामे अब भी, हर मुश्किल में चलता हूँ।
बस इतनी सी दुआ है रब से, जब भी अगला जनम मिले,
आपका ही बेटा बनकर, आपके आँगन फूल खिले।
आप ही मेरा गर्व हैं, आप ही मेरा अभिमान हैं,
मेरे सर का ताज हैं आप, आप ही मेरी पहचान हैं।
हाँ पापा, आप ही मेरी सबसे बड़ी पहचान हैं।
~ किर्तिश श्रोत्रिय




