क्या मोहब्बत में कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका जवाब देने की नहीं — बस महसूस करने की ज़रूरत होती है? ये ग़ज़ल उन सब के लिए है जो किसी के इंतज़ार में बैठे हैं, और सोचते हैं कि बिना कहे भी सामने वाला सब समझ जाएगा। मैंने भी कुछ ऐसे ही सवाल किए हैं, सुनिएगा कि जवाब में क्या मिलता है— पहचान से लेकर आख़िरी उड़ान तक।
गर कह दूं कि इश्क हुआ है, तो क्या मान लोगे,
मेरी आँखों में देखोगे उसे, तो क्या पहचान लोगे।
हमने तो सौंप दी, हर धड़कन तुम्हारे हाथ में,
अब क्या और मेरी वफ़ा का इम्तेहान लोगे?
तुम्हारी एक नज़र ही काफी है क़त्ल करने को,
फिर क्यों पलकें झुका कर यूँ मेरी जान लोगे?
कभी तो बिना कहे भी समझो मेरी खामोशी को,
या हर बार 'इज़हार' के लिए मेरी ही ज़ुबान लोगे?
दीन, दुनिया, उसूल... सब छोड़ बैठे हैं तेरे इश्क़ में,
क्या अब इस बंदे का बचा-खुचा ईमान लोगे?
आँसू तो पहले ही दे चुके हो तुम इन आँखों को,
अब क्या मेरे होंठों की ये बची हुई मुस्कान लोगे?
पंख तो पहले ही कतर चुके हो 'श्रोत्रिय' के तुम,
क्या अब इस तड़पते परिंदे की आखिरी उड़ान लोगे?
~ किर्तिश श्रोत्रिय