Tuesday, July 7, 2026

Friends for a Season

क्या आपकी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसे चेहरे आए जो कुछ वक़्त के लिए फ़रिश्ता बनकर आए, दर्द बाँटा और फिर ख़ामोशी से रुख़्सत हो गए? यह कविता उन्हीं अनकहे रिश्तों को समर्पित है।


इस जीवन के सफर में बहुत से अनजान लोग मिल जाया करते हैं,

पता ही नहीं चलता कब वो हमारी कहानी के अहम किरदार हो जाया करते हैं।


वो लोग जिन्हें कुछ वक्त पहले तक हम जानते नहीं थे,

वो चेहरे जिन्हें कुछ सालों पहले तक पहचानते नहीं थे।


वो लोग हमारे जीवन में कुछ नए से रंग भर दिया करते हैं,

हमारी हर समस्याओं को हर कर, हमें चिंता-मुक्त कर दिया करते हैं।


वैसे ऊपरवाला जब भी हमारी जिंदगी में कुछ मुश्किलें दिया करता है,

उसके साथ ही वो उन मुश्किलों को आसान करने का हल भी दिया करता है।


कुछ वक्त के लिए ही सही वो एक फ़रिश्ते की तरह हमारी जिंदगी में आते हैं,

हमारे हर दर्द-ओ-ग़म को अपना बना कर, हमें मुस्कुराता छोड़ जाते हैं।


शायद इस सफर में उनका साथ तक़दीर को वही तक मंजूर होता है ,

शायद उनसे मिलना और मिल कर बिछड़ना जीवन का दस्तूर होता है।


अफ़सोस तो है वो लोग आज हमारी ख़ुशियों में हमारे पास नहीं हैं,

उनकी याद ही है अब साथ, वो रूबरू हमारे साथ नहीं हैं।


लेकिन वो लोग हमारे सफर के अहम हिस्से जरूर रहेंगे,

वो साथ रहे या न रहे पर उनके वो हंसते गुदगुदाते किस्से जरूर रहेंगे।


                                                                              ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 30, 2026

Khairiyat

कब आख़िरी बार आपने किसी अपने से बस यूँ ही, बिना किसी वजह के, उसका हाल पूछा था? इस भागदौड़ में हम अपनों को ही भूलते जा रहे हैं — यह कविता उसी अफ़सोस की आवाज़ है।


बड़े दिनों से बात नहीं हुई, दोस्त,
तो सोचा तुम्हारा हाल पूछ लूँ।
कैसे हो, किस हाल में हो,
बस इतना-सा सवाल पूछ लूँ।


सोचा आज इस भागदौड़ के दौर में,
तुमसे तुम्हारी खैरियत पूछी जाए,
तुम्हारे मम्मी-पापा, भाई-बहन,
परिवार की भी तबीयत पूछी जाए।


इतने दिनों से मुलाक़ात नहीं हुई,
तो सोचा, अपनी आवाज़ ही तुम्हें सुना देता हूँ,
तुमने तो याद किया नहीं,
पर मैं ही सही, तुम्हें अपनी याद दिला देता दूँ।


ज़्यादा नहीं, बस इतना कहूँगा,
कि कभी तुम भी अपनी आवाज़ सुना देते।
मिल जाता अगर वक़्त किसी दिन,
तो एक फ़ोन ही सही हमें लगा देते।


अब अगर कहो कि वक़्त ही नहीं था तुम्हें,
तो मुझे हैरत भी नहीं होगी।
जानता हूँ मैं  इन उलझनों में,
शायद तुम्हें भी फुर्सत नहीं होगी।


ख़ैर छोड़ो… कहाँ इन गंभीर बातों में वक़्त गँवाना,
ज़िंदगी छोटी है दोस्त, कहाँ इन बातों का बोझ उठाना।


यह सोचकर कि कर लेंगे बात किसी और दिन,
अभी कौन-सी जल्दी पड़ी है।

तुम्हें लगता ज़रूर है कि वक़्त बहुत है,
अभी ज़िंदगी बहुत बड़ी है।


मगर किसे पता फिर उस आवाज़ को
कभी सुन पाने का दोबारा मौका मिले या न मिले,
उस बीते हुए लम्हे में जाने का
झरोखा भी मिले या न मिले।


पर ऐ दोस्त, इस आपाधापी में क्या भरोसा,
कब कौन-सा शख़्स कहाँ गुमनाम हो जाए।
और याद कर लेना अपने अपनों को,
इससे पहले कि ज़िंदगी की आख़िरी शाम हो जाए…


                                                ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 23, 2026

Jaruri To Nahi

जिससे प्यार करें, वो भी उतना ही प्यार करे — क्या यह ज़रूरी है? इस ग़ज़ल में एकतरफ़ा मोहब्बत के दर्द को बड़ी नज़ाकत से बयां किया गया है।


मैं जिससे इश्क़ करूँ, वो मुझसे इश्क़ करे, ये जरूरी तो नहीं।

उसके ख़्वाबों में हो मेरा भी रह-बसर, ये जरूरी तो नहीं॥


मैंने चाहा उसे इतना, दीवानगी की हद तक।

मेरी चाहत का हो उस पर असर, ये जरूरी तो नहीं॥


उसके हर एक लम्हे, हर एक घड़ी का हिसाब रखा मैंने।

मगर उसे भी हो मेरी खैरों-ख़बर, ये जरूरी तो नहीं॥


कुछ देर उसे गर न देखता, तो तलब सी लग जाती थी।

मैं भी उसे इस क़दर ज़रूरी हूँ, ये ज़रूरी तो नहीं॥


वो मिल जाता इस सफ़र में, तो और ही बात थी।

उसी पर आकर थमे ज़िंदगी की डगर, ये ज़रूरी तो नहीं॥


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 16, 2026

Aur kitna batega Hindustan

जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बँटता हुआ देश आख़िर कब तक यूँ ही लहूलुहान होता रहेगा? यह ओजस्वी कविता सत्ता की राजनीति पर एक सीधा और तीखा सवाल है।



रो-रोकर हर सिसकी में, अब एक ही प्रश्न महान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बाँटने चले अपना ईमान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?


नफ़रत की आग में जलने की, अब भाषा की बारी है, 

सज्जन सारे मौन खड़े हैं, दुर्जन की तैयारी है। 

कहीं भाषा, कहीं मज़हब, कहीं जाति का धंधा है, 

ये देशभक्ति नहीं साहब, ये कुर्सी का हथकंडा है!

चमकाने को अपनी किस्मत, घर में आग लगाते हैं, 

ये कुर्सी के भूखे भेड़िये, देश को रोज डराते हैं।


भाई को भाई से लड़वाकर, अपनी महफ़िल सजवातें हैं,

ये भाषा के नाम पर देखो, नफरत का ज़हर उगाते हैं। 

कहीं मराठी, कहीं कन्नड़ का, ये कैसा शोर मचाते हैं? 

जनता सड़कों पर लड़ती है, ये सत्ता के सुख पाते हैं।


जिस थाली में खाते हैं ये, उसी में छेद ये करते हैं, 

बिन पेंदे के लोटे बनकर, पाले रोज बदलते हैं। 

बाहर के दुश्मन से लड़ना, तो फिर भी आसान यहाँ, 

पर घर के भीतर बैठे इन, भेड़ियों का क्या काम यहाँ?

 

जल रहा बंगाल आज क्यों, दिल्ली मौन खड़ी क्यों है? 

सत्ता की ये भूख बताओ, देश से इतनी बड़ी क्यों है?

क्या संसद तब जागेगी जब, सड़कों पर खून बहेगा? 

क्या लाशों के ढेरों पर ही, ये सिंहासन टिका रहेगा?


खालिस्तान के नाम पर जो, साज़िश गहरी जारी है,

'चिकन-नेक' को काटने की, गद्दारों की तैयारी है। 

हे रक्षक! तुम मौन रहे तो, जयद्रथ जीत ही जायेंगे, 

इन शकुनि की चालों पर हम, अपना सर्वस्व: गँवाएंगे।


तुमसे ही उम्मीद लगायी, तुमको ही विश्वास दिया, 

पर तुमने ही सरेआम अब, अपनों को निराश किया।

मगर अफसोस! आज अपनों का ही, लहू सड़कों पे बहता है, 

वो रक्षक खामोश क्यों है, जो हरदम 'शक्ति' कहता है? 

गर घर के भेड़िये न कुचले, तो इतिहास क्या बोलेगा? 

जब आने वाली नस्लों का, हर बच्चा मुँह खोलेगा।


लीच बने ये सत्ताधारी, जन-जन का खून चूसते हैं, 

मतलब की रोटी सेंकने को, घर में लपटें फूँकते हैं। 

अब तो जागो देशवासियों, वरना कल पछताओगे, 

टुकड़े-टुकड़े होकर अपनी, अस्मत भी खो जाओगे।


रो-रोकर हर सिसकी में, अब एक ही प्रश्न महान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बाँटने चले अपना ईमान, 

भारत माता पूछ रही— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?



                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 9, 2026

High Priority

हर मेल "urgent", हर काम "हाई प्रायोरिटी" — पर क्या ज़िंदगी की प्राथमिकता कहीं पीछे छूट नहीं रही? कॉर्पोरेट ज़िंदगी की उलझन पर एक गहरा सवाल।


ज़रा सोचिए…


हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,

हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।


कल भी तो हो सकता था ये काम आराम से,

आज ही तलवार सी ये पाबंदी क्यों है।


न कोई यहाँ मरता है, न कोई जी उठता यहाँ,

फिर हर मेल में ऐसी सनसनी क्यों है।


कभी “urgent”, कभी “asap” की आवाज़ें उठती हैं,

हर शब्द में इतनी बेचैनी क्यों है।


निकले थे घर से कि मेहनत से कुछ बन जाएगा,

अब घर से ज़्यादा दफ़्तर में ज़िंदगी क्यों है।


रोटी के लिए निकले थे, सोचा था सुकून भी मिलेगा,

रोटी तो मिलती है… पर मुस्कान गुमशुदा क्यों है।


कहते हैं — “वर्क–लाइफ़ बैलेंस” है दुनिया में,

फिर हर शाम हमारी ही क़ुर्बानी क्यों है।


हम काम करें ताकि थोड़ा जी भी सकें,

फिर काम ही जीने की बंदगी क्यों है।


और आख़िर में बस इतना सा सवाल है साहब—


अगर काम ही सब कुछ है इस दुनिया में,

तो घर, परिवार और मोहब्बत बनी क्यों है?


और काम के पीछे भागते-भागते

ज़िंदगी ही पीछे छूटती क्यों है।


हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,

हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।


                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 2, 2026

Hathon me tera hath ho

समंदर की लहरें, चाँदनी रात और बस हाथों में तेरा हाथ — क्या मोहब्बत का यही सबसे ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं होता? एक रूमानी एहसास से भरी कविता।


लहरों की आवाज़ हो, आँखों आँखों में बात हो,  
साहिलों पर बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

झिलमिल सितारों से सजी हुई, एक शबनमी कायनात हो,  
दूर तलक खामोशी हो, कोई भी आस-पास न हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

दिलों में बजते गीत में, मोहब्बत के जजबात हो,  
हवाओं में जो महसूस हो, वह बेहिसाब इश्क़ हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

सुनहरी साँझ के आलम में सजे, मखमली से ख्वाब हों,  
संगीत की तारों में उलझे हुए, इश्क़ के वो साज़ हों।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

चाँद की चाँदनी में रंगा, हुस्न का लिबास हो,  
दिल की हर धड़कन में बसा, इश्क़ का एहसास हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।

~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, May 26, 2026

Muqaddar

जीत के ठीक क़रीब पहुँचकर भी अगर किनारा हाथ से छूट जाए, तो क़िस्मत पर यक़ीन कैसे रखें? इस ग़ज़ल में नाकामी और उम्मीद की जद्दोजहद है।


हाथों तक आया मुक़द्दर, फिर भी सहारा न मिला,

जीत के ठीक किनारे, मुझको किनारा न मिला

रात भर जोड़ता रहा साँसों से टूटी उम्मीद,

सुबह होते ही क़िस्मत से कोई इशारा न मिला


इन राहों ने कई दफ़ा बाँहों में थामा मुझे,

पर मंज़िल का कहीं से भी साफ़ नज़ारा न मिला


भीड़ संग चलते रहे लोग हज़ारों रफ़्ता-रफ़्ता,

दिल से दिल तक पहुँचने वाला कोई प्यारा न मिला


क़िस्मत की हवा में बोए थे हमने कितने उजाले,

शहर-ए-अंधेर में फिर भी ज़रा-सा उजियारा न मिला


सब्र ने थामे रखा टूटते लम्हों की गिरह में,

दर्द से आगे जीने का कोई गुज़ारा न मिला


श्रोत्रिय कहता है—नज़र रख सफ़र की सदा पर,

मौक़ा मुझे मेरी क़िस्मत से अभी दुबारा न मिला


                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय





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