कहते हैं जब किसी से सच्चा इश्क़ होता है, तो सबसे पहले हमारी मुस्कुराहटें ही हमारा राज़ खोल देती हैं। यह ग़ज़ल उसी एहसास का जश्न है, जब किसी के आने से चाँद पहले से ज़्यादा खूबसूरत, और ज़िंदगी पहले से ज़्यादा रोशन लगने लगती है..
ये मेरी आँखों का धोखा है, या तेरा इश्क़ चढ़ने लगा है,
न जाने क्यों ये चाँद... अब पहले से बेहतर लगने लगा है।
अधूरी सी चल रही थी जो कहानी मेरी अब तक,
तेरे आने से उसके मुकम्मल होने का, यक़ीं जगने लगा है।
डगमगा रही थी जो कश्ती मेरे इस सफ़र की,
तुम्हारी आहट से ही... उसे किनारा दिखने लगा है।
एक अरसे से ख़ामोश पड़ा था मेरे सीने में जो,
वो दिल अब तेरे नाम से... फिर धड़कने लगा है।
रोशनी तो पहले भी थी, ज़िंदगी के इन कमरों में,
पर तुम्हारी मौजूदगी से... अब उजालों को मतलब मिलने लगा है।
कल तक बेपरवाह सा फिरता था जो शख़्स ज़माने में,
तेरी फ़िक्र में पड़कर... अब वो भी ख़ुद को बदलने लगा है।
मुस्कुराहट तो वैसे हमेशा से थी 'श्रोत्रिय' के होंठों पर,
पर सच कहूँ... आजकल ये चेहरा कुछ ज़्यादा ही खिलने लगा है।
~ किर्तिश श्रोत्रिय