स्क्रीन में सिमटी ज़िंदगी, स्वाइप होता इश्क़, और रातों-रात शोहरत की चाहत — क्या हम सब जल्दी में इतना कुछ खो नहीं रहे? ये कविता एक ठहराव की सलाह है, उस पीढ़ी के लिए जिसे सब कुछ 'इंस्टेंट' चाहिए।
हर साँस में है भाग-दौड़, हर आँख में इक होड़ है,
किस मोड़ पर पहुँचेगा तू, ये कैसी अंधी दौड़ है?
लोकल की उस भीड़ में भी, हर शख़्स यहाँ अकेला है,
कानों में इयरफ़ोन लगे, आँखों में ख़ुद का मेला है।
चाहत भी अब 'स्वाइप' हुई, और भूख भी 'ऑर्डर' पर,
सिकुड़ गई दुनिया सारी, बस मोबाइल के बॉर्डर पर।
तीन घंटे की फ़िल्म भारी, सब्र नहीं अब आँखों में,
पूरी रातें कट जाती हैं, तीस सेकंड के झाँसों में!
'सीन' हुए पैग़ाम पड़े हैं, बातों का कोई मोल नहीं,
एक मेज़ पर बैठे दो दिल, लेकिन कोई बोल नहीं।
पास ज़रूर बैठे हैं मगर, छूता कोई अहसास नहीं,
आँखें बस स्क्रीनों पर गड़ी हैं, कोई किसी के पास नहीं।
अब इश्क़ भी है फ़ास्ट-फ़ूड सा, बस आदतों का नाम है,
सुबह मिले और शाम जुदा, ये कैसा नया मुकाम है?
मेहनत तुझको रास नहीं, बिना नींव इमारत भाती है,
रातों-रात उठे जो शोहरत, बस वो ही चाहत आती है।
पर याद रख, जो पल में बना, वो पल भर में बर्बाद है,
बुलबुले सी उम्र है उसकी, जिसे तू समझता बुनियाद है।
ये अटल नियम कुदरत का है, वक़्त रहते तू जान ले,
बिना जड़ों के जो पनपा, उसका गिरना तू मान ले।
जिस पेड़ ने न सब्र से, अपनी जड़ों को गाड़ा है,
उसे वक़्त की इक हल्की सी, आँधी ने पछाड़ा है।
तो थोड़ा ठहर, कुछ वक़्त दे, जड़ों को ज़मीं में उतरने दे,
इस बेतहाशा ज़िंदगी को, ज़रा अपनी चाल से चलने दे।
रिश्तों को भी साँसें दे, जज़्बातों को भी ढलने दे,
जो आग जला दी है दिल में, उसे धीमी आँच पे जलने दे।
क्यूँकि...
जो हर चीज़ जल्दी में पा गया, वो अंत में सब हारता है,
और जो सब्र से सींचा जाए, वो वक़्त को भी मारता है!
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