हाथों तक आया मुक़द्दर, फिर भी सहारा न मिला,
जीत के ठीक किनारे, मुझको किनारा न मिला।रात भर जोड़ता रहा साँसों से टूटी उम्मीद,
सुबह होते ही क़िस्मत से कोई इशारा न मिला।
इन राहों ने कई दफ़ा बाँहों में थामा मुझे,
पर मंज़िल का कहीं से भी साफ़ नज़ारा न मिला।
भीड़ संग चलते रहे लोग हज़ारों रफ़्ता-रफ़्ता,
दिल से दिल तक पहुँचने वाला कोई प्यारा न मिला।
क़िस्मत की हवा में बोए थे हमने कितने उजाले,
शहर-ए-अंधेर में फिर भी ज़रा-सा उजियारा न मिला।
सब्र ने थामे रखा टूटते लम्हों की गिरह में,
दर्द से आगे जीने का कोई गुज़ारा न मिला।
श्रोत्रिय कहता है—नज़र रख सफ़र की सदा पर,
मौक़ा मुझे मेरी क़िस्मत से अभी दुबारा न मिला।
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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