Tuesday, May 26, 2026

Muqaddar


हाथों तक आया मुक़द्दर, फिर भी सहारा न मिला,

जीत के ठीक किनारे, मुझको किनारा न मिला

रात भर जोड़ता रहा साँसों से टूटी उम्मीद,

सुबह होते ही क़िस्मत से कोई इशारा न मिला


इन राहों ने कई दफ़ा बाँहों में थामा मुझे,

पर मंज़िल का कहीं से भी साफ़ नज़ारा न मिला


भीड़ संग चलते रहे लोग हज़ारों रफ़्ता-रफ़्ता,

दिल से दिल तक पहुँचने वाला कोई प्यारा न मिला


क़िस्मत की हवा में बोए थे हमने कितने उजाले,

शहर-ए-अंधेर में फिर भी ज़रा-सा उजियारा न मिला


सब्र ने थामे रखा टूटते लम्हों की गिरह में,

दर्द से आगे जीने का कोई गुज़ारा न मिला


श्रोत्रिय कहता है—नज़र रख सफ़र की सदा पर,

मौक़ा मुझे मेरी क़िस्मत से अभी दुबारा न मिला


                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय





Don't forget to Like, comment and share with your friends and family.


© Kirtish Shrotriya. Unauthorized copying prohibited.

No comments:

Post a Comment