Tuesday, May 12, 2026

Dard


क्या अपना कोई दर्द लिखूं मैं,

क्या अपने जज़्बात लिखूं।

नस-नस में है चुभते काँटे,

कैसे अपने हालत लिखूँ।


अंतर्मन में जलती ज्वाला,

तन शोलो का संचार करे।

पल पल बढ़ती इस अग्नि को,

कैसे सरिता की धार लिखूँ।


मैत्री के इन वृक्षों पर,

सभी फूल मुरझाये है।

इस उजड़े हुए चमन को मैं,

कैसे बगिया गुलज़ार लिखूँ।


धक धक प्रतिपल चलती धड़कन,

धड़कन में किसका नाम लिखूँ।

इस टूटे हुए हृदय से मैं,

कैसे साँसों का हिसाब लिखूँ।


अपने जीवन को अब कैसे,

अनुपम सहज साकार लिखूँ।

अपनी हृदय वेदना को कैसे मैं,

इस जीवन का आधार लिखूँ।


                            ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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