जिसे देखे बरसों बीत गए, फिर भी दिल हर पल उसी की एक झलक ढूंढता है। दूरी की तड़प और इश्क़ की गवाही देती एक गहरी ग़ज़ल।
वो जो दिखा नहीं है कई जमाने से।
कोई मिला दो उस चाँद को इस परवाने से।
रुपया, ज़मीन, जायदाद जो भी है सब ले जाओ।
बस दिखा दो उसकी एक झलक किसी बहाने से।
कितना है, कैसा है, क्यों है, उनसे इश्क़ ये ना पूछो।
चाहतो की बातो को, तोला नही करते किसी पैमाने से।
वो कसमें, वो वादे, वो बाते उनकी।
अब धुन्दला गयी है दिन के आशियाने से।
इश्क है उनसे ये कहा था, कहा है, कहेंगे हर दिन।
मोहब्बत करने वाले डरते नहीं ज़माने से।
दीदार-ए-यार को तड़पे है बहुत ज़मानों से।
उनसे कहना एक बार तो आ कर मिल ले अपने दीवाने से।
~ किर्तिश श्रोत्रिय

No comments:
Post a Comment