Tuesday, June 30, 2026

Khairiyat – Dosti Par Hindi Kavita | Kirtish Shrotriya

कब आख़िरी बार आपने किसी अपने से बस यूँ ही, बिना किसी वजह के, उसका हाल पूछा था? इस भागदौड़ में हम अपनों को ही भूलते जा रहे हैं — यह कविता उसी अफ़सोस की आवाज़ है।


बड़े दिनों से बात नहीं हुई, दोस्त,
तो सोचा तुम्हारा हाल पूछ लूँ।
कैसे हो, किस हाल में हो,
बस इतना-सा सवाल पूछ लूँ।


सोचा आज इस भागदौड़ के दौर में,
तुमसे तुम्हारी खैरियत पूछी जाए,
तुम्हारे मम्मी-पापा, भाई-बहन,
परिवार की भी तबीयत पूछी जाए।


इतने दिनों से मुलाक़ात नहीं हुई,
तो सोचा, अपनी आवाज़ ही तुम्हें सुना देता हूँ,
तुमने तो याद किया नहीं,
पर मैं ही सही, तुम्हें अपनी याद दिला देता हूँ।


ज़्यादा नहीं, बस इतना कहूँगा,
कि कभी तुम भी अपनी आवाज़ सुना देते।
मिल जाता अगर वक़्त किसी दिन,
तो एक फ़ोन ही सही हमें लगा देते।


अब अगर कहो कि वक़्त ही नहीं था तुम्हें,
तो मुझे हैरत भी नहीं होगी।
जानता हूँ मैं  इन उलझनों में,
शायद तुम्हें भी फुर्सत नहीं होगी।


ख़ैर छोड़ो… कहाँ इन गंभीर बातों में वक़्त गँवाना,
ज़िंदगी छोटी है दोस्त, कहाँ इन बातों का बोझ उठाना।


यह सोचकर कि कर लेंगे बात किसी और दिन,
अभी कौन-सी जल्दी पड़ी है।

तुम्हें लगता ज़रूर है कि वक़्त बहुत है,
अभी ज़िंदगी बहुत बड़ी है।


मगर किसे पता फिर उस आवाज़ को
कभी सुन पाने का दोबारा मौका मिले या न मिले,
उस बीते हुए लम्हे में जाने का
झरोखा भी मिले या न मिले।


पर ऐ दोस्त, इस आपाधापी में क्या भरोसा,
कब कौन-सा शख़्स कहाँ गुमनाम हो जाए।
और याद कर लेना अपने अपनों को,
इससे पहले कि ज़िंदगी की आख़िरी शाम हो जाए…


                                                ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 23, 2026

Jaruri To Nahi – Ektarfa Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

जिससे प्यार करें, वो भी उतना ही प्यार करे — क्या यह ज़रूरी है? इस ग़ज़ल में एकतरफ़ा मोहब्बत के दर्द को बड़ी नज़ाकत से बयां किया गया है।


मैं जिससे इश्क़ करूँ, वो मुझसे इश्क़ करे, ये जरूरी तो नहीं।

उसके ख़्वाबों में हो मेरा भी रह-बसर, ये जरूरी तो नहीं॥


मैंने चाहा उसे इतना, दीवानगी की हद तक।

मेरी चाहत का हो उस पर असर, ये जरूरी तो नहीं॥


उसके हर एक लम्हे, हर एक घड़ी का हिसाब रखा मैंने।

मगर उसे भी हो मेरी खैरों-ख़बर, ये जरूरी तो नहीं॥


कुछ देर उसे गर न देखता, तो तलब सी लग जाती थी।

मैं भी उसे इस क़दर ज़रूरी हूँ, ये ज़रूरी तो नहीं॥


वो मिल जाता इस सफ़र में, तो और ही बात थी।

उसी पर आकर थमे ज़िंदगी की डगर, ये ज़रूरी तो नहीं॥


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 16, 2026

Aur Kitna Batega Hindustan – Deshbhakti Kavita | Kirtish Shrotriya

जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बँटता हुआ देश आख़िर कब तक यूँ ही लहूलुहान होता रहेगा? यह ओजस्वी कविता सत्ता की राजनीति पर एक सीधा और तीखा सवाल है।


रो-रोकर हर सिसकी में अब, उठता एक ही प्रश्न महान,

भारत माता पूछ रही है— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बेचने चले अपना ईमान,

भारत माता पूछ रही है— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?


नफ़रत की  आग में जलने को, अब बोलो किसकी बारी है?

मौन खड़े हैं सज्जन सारे, दुर्जन की तैयारी है!

कहीं पंथ, कहीं मज़हब, कहीं जाति का धंधा है,

ये राष्ट्रभक्ति नहीं साहब, ये कुर्सी का हथकंडा है!

चमकाने को अपनी किस्मत, जो घर में आग लगाते हैं,

कुर्सी के ये भूखे भेड़िये, देश को रोज़ डराते हैं।


भाई को भाई से लड़वाकर, महफ़िल अपनी चमकाते हैं,

बँटवारे की आड़ में देखो, नफ़रत का ज़हर उगाते हैं।

कहीं प्रांत, कहीं भाषा का, कैसा शोर मचाते हैं,

जनता सड़कों पर कटती है, ये सत्ता का सुख पाते हैं!


जिस थाली में खाते हैं ये, उसी में छेद ये करते हैं,

बिन पेंदे के लोटे बनकर, पाले रोज़ बदलते हैं।

बाहर के दुश्मन से लड़ना, तो फिर भी आसान यहाँ,

पर भीतर बैठे गद्दारों का, बोलो क्या है काम यहाँ?


सुलग रही सीमाएँ अपनी, दिल्ली मौन खड़ी क्यों है?

सत्ता की ये भूख बताओ, देश से इतनी बड़ी क्यों है?

क्या संसद तब जागेगी जब, सड़कों पर ख़ून बहेगा?

क्या लाशों के ढेरों पर ही, ये सिंहासन टिका रहेगा?


सरहद के उस पार बैठे, दुश्मन घात लगाए हैं,

टुकड़े-टुकड़े करने को, नित नए बहाने लाए हैं।

खालिस्तान के नाम रची जो, साज़िश अब भी जारी है,

वो भी हमला विफल तो अगली चिकन नेक की बारी है।


हे रक्षक! तुम मौन रहे तो, जयद्रथ जीत ही जाएँगे,

इन शकुनियों की चालों पर, अपना सर्वस्व गँवाएँगे!

तुमसे ही उम्मीद लगाई, तुमको ही विश्वास दिया,

पर तुमने ही सरेआम यूँ, अपनों को है निराश किया!


पर देखो आज अपनों का, लहू सड़कों पर बहता है,

वह रक्षक खामोश क्यों है, जो हरदम 'शक्ति' कहता है?

गर घर के ये बिच्छू न कुचले, तो इतिहास क्या बोलेगा?

जब आने वाली नस्लों का, हर बच्चा मुँह खोलेगा!


दीमक बन ये सत्ताधारी, जन-जन का ख़ून चूसते हैं,

मतलब की रोटी सेंकने को, घर में लपटें फूँकते हैं।

अब भी जागो भारत-पुत्रों! वरना कल पछताओगे,

टुकड़े-टुकड़े होकर अपनी, अस्मत ही खो जाओगे!


मज़हब की इन दीवारों को, अब ठोकर मार गिराना है,

जो बाँट रहे इस आँगन को, उनको अब धूल चटाना है!

पंथों से ऊपर उठकर अब, राष्ट्र-धर्म अपनाना होगा,

हर आस्तीन के साँपों को, धूल में हमें मिलाना होगा!


उठो कि अब इस कायरता का, इतिहास बदलना बाकी है,

सोई तरुणाई का उठकर, हुंकार उगलना बाकी है!

अब थमेगा तांडव नफ़रत का, गूँजेगा सिंहनाद महान,

अब गरज के दुश्मन से कह दो— "नहीं बँटेगा हिंदुस्तान!"


अब खंड-खंड होने से इस, पावन मिट्टी को बचाएंगे,

सौगंध हमें इस माटी की, नया इतिहास बनाएंगे!

गूँजेगा अम्बर-धरती पर, बस एक यही संकल्प महान—

"नहीं बँटेगा... नहीं बँटेगा... नहीं बँटेगा हिंदुस्तान!"


जय हिन्द! भारत माता की जय!



                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 9, 2026

High Priority – Corporate Life Par Nazm | Kirtish Shrotriya

हर मेल "urgent", हर काम "हाई प्रायोरिटी" — पर क्या ज़िंदगी की प्राथमिकता कहीं पीछे छूट नहीं रही? कॉर्पोरेट ज़िंदगी की उलझन पर एक गहरा सवाल।


ज़रा सोचिए…


हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,

हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।


कल भी तो हो सकता था ये काम आराम से,

आज ही तलवार सी ये पाबंदी क्यों है।


न कोई यहाँ मरता है, न कोई जी उठता यहाँ,

फिर हर मेल में ऐसी सनसनी क्यों है।


कभी “urgent”, कभी “asap” की आवाज़ें उठती हैं,

हर शब्द में इतनी बेचैनी क्यों है।


निकले थे घर से कि मेहनत से कुछ बन जाएगा,

अब घर से ज़्यादा दफ़्तर में ज़िंदगी क्यों है।


रोटी के लिए निकले थे, सोचा था सुकून भी मिलेगा,

रोटी तो मिलती है… पर मुस्कान गुमशुदा क्यों है।


कहते हैं — “वर्क–लाइफ़ बैलेंस” है दुनिया में,

फिर हर शाम हमारी ही क़ुर्बानी क्यों है।


हम काम करें ताकि थोड़ा जी भी सकें,

फिर काम ही जीने की बंदगी क्यों है।


और आख़िर में बस इतना सा सवाल है साहब—


अगर काम ही सब कुछ है इस दुनिया में,

तो घर, परिवार और मोहब्बत बनी क्यों है?


और काम के पीछे भागते-भागते

ज़िंदगी ही पीछे छूटती क्यों है।


हर काम यहाँ “हाई प्रायोरिटी” क्यों है,

हर साँस पे डेडलाइन की हड़बड़ी क्यों है।


                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 2, 2026

Hathon Me Tera Hath Ho – Romantic Kavita | Kirtish Shrotriya

समंदर की लहरें, चाँदनी रात और बस हाथों में तेरा हाथ — क्या मोहब्बत का यही सबसे ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं होता? एक रूमानी एहसास से भरी कविता।


लहरों की आवाज़ हो, आँखों आँखों में बात हो,  
साहिलों पर बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

झिलमिल सितारों से सजी हुई, एक शबनमी कायनात हो,  
दूर तलक खामोशी हो, कोई भी आस-पास न हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

दिलों में बजते गीत में, मोहब्बत के जजबात हो,  
हवाओं में जो महसूस हो, वह बेहिसाब इश्क़ हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

सुनहरी साँझ के आलम में सजे, मखमली से ख्वाब हों,  
संगीत की तारों में उलझे हुए, इश्क़ के वो साज़ हों।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।  

चाँद की चाँदनी में रंगा, हुस्न का लिबास हो,  
दिल की हर धड़कन में बसा, इश्क़ का एहसास हो।  
बस यूंही तेरे पास बैठे रहें हम, और हाथों में तेरा हाथ हो।

~ किर्तिश श्रोत्रिय




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