Tuesday, June 16, 2026

Aur Kitna Batega Hindustan – Deshbhakti Kavita | Kirtish Shrotriya

जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बँटता हुआ देश आख़िर कब तक यूँ ही लहूलुहान होता रहेगा? यह ओजस्वी कविता सत्ता की राजनीति पर एक सीधा और तीखा सवाल है।

Aur Kitna Batega Hindustan Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya


रो-रोकर हर सिसकी में अब, उठता एक ही प्रश्न महान,

भारत माता पूछ रही है— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?

जाति-धर्म में बाँट दिया, अब बेचने चले अपना ईमान,

भारत माता पूछ रही है— और कितना बँटेगा हिंदुस्तान?


नफ़रत की  आग में जलने को, अब बोलो किसकी बारी है?

मौन खड़े हैं सज्जन सारे, दुर्जन की तैयारी है!

कहीं पंथ, कहीं मज़हब, कहीं जाति का धंधा है,

ये राष्ट्रभक्ति नहीं साहब, ये कुर्सी का हथकंडा है!

चमकाने को अपनी किस्मत, जो घर में आग लगाते हैं,

कुर्सी के ये भूखे भेड़िये, देश को रोज़ डराते हैं।


भाई को भाई से लड़वाकर, महफ़िल अपनी चमकाते हैं,

बँटवारे की आड़ में देखो, नफ़रत का ज़हर उगाते हैं।

कहीं प्रांत, कहीं भाषा का, कैसा शोर मचाते हैं,

जनता सड़कों पर कटती है, ये सत्ता का सुख पाते हैं!


जिस थाली में खाते हैं ये, उसी में छेद ये करते हैं,

बिन पेंदे के लोटे बनकर, पाले रोज़ बदलते हैं।

बाहर के दुश्मन से लड़ना, तो फिर भी आसान यहाँ,

पर भीतर बैठे गद्दारों का, बोलो क्या है काम यहाँ?


सुलग रही सीमाएँ अपनी, दिल्ली मौन खड़ी क्यों है?

सत्ता की ये भूख बताओ, देश से इतनी बड़ी क्यों है?

क्या संसद तब जागेगी जब, सड़कों पर ख़ून बहेगा?

क्या लाशों के ढेरों पर ही, ये सिंहासन टिका रहेगा?


सरहद के उस पार बैठे, दुश्मन घात लगाए हैं,

टुकड़े-टुकड़े करने को, नित नए बहाने लाए हैं।

खालिस्तान के नाम रची जो, साज़िश अब भी जारी है,

वो भी हमला विफल तो अगली चिकन नेक की बारी है।


हे रक्षक! तुम मौन रहे तो, जयद्रथ जीत ही जाएँगे,

इन शकुनियों की चालों पर, अपना सर्वस्व गँवाएँगे!

तुमसे ही उम्मीद लगाई, तुमको ही विश्वास दिया,

पर तुमने ही सरेआम यूँ, अपनों को है निराश किया!


पर देखो आज अपनों का, लहू सड़कों पर बहता है,

वह रक्षक खामोश क्यों है, जो हरदम 'शक्ति' कहता है?

गर घर के ये बिच्छू न कुचले, तो इतिहास क्या बोलेगा?

जब आने वाली नस्लों का, हर बच्चा मुँह खोलेगा!


दीमक बन ये सत्ताधारी, जन-जन का ख़ून चूसते हैं,

मतलब की रोटी सेंकने को, घर में लपटें फूँकते हैं।

अब भी जागो भारत-पुत्रों! वरना कल पछताओगे,

टुकड़े-टुकड़े होकर अपनी, अस्मत ही खो जाओगे!


मज़हब की इन दीवारों को, अब ठोकर मार गिराना है,

जो बाँट रहे इस आँगन को, उनको अब धूल चटाना है!

पंथों से ऊपर उठकर अब, राष्ट्र-धर्म अपनाना होगा,

हर आस्तीन के साँपों को, धूल में हमें मिलाना होगा!


उठो कि अब इस कायरता का, इतिहास बदलना बाकी है,

सोई तरुणाई का उठकर, हुंकार उगलना बाकी है!

अब थमेगा तांडव नफ़रत का, गूँजेगा सिंहनाद महान,

अब गरज के दुश्मन से कह दो— "नहीं बँटेगा हिंदुस्तान!"


अब खंड-खंड होने से इस, पावन मिट्टी को बचाएंगे,

सौगंध हमें इस माटी की, नया इतिहास बनाएंगे!

गूँजेगा अम्बर-धरती पर, बस एक यही संकल्प महान—

"नहीं बँटेगा... नहीं बँटेगा... नहीं बँटेगा हिंदुस्तान!"


जय हिन्द! भारत माता की जय!



                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




Don't forget to Like, comment and share with your friends and family.


© Kirtish Shrotriya. Unauthorized copying prohibited.

No comments:

Post a Comment