बड़े दिनों से बात नहीं हुई, दोस्त,
तो सोचा तुम्हारा हाल पूछ लूँ।
कैसे हो, किस हाल में हो,
बस इतना-सा सवाल पूछ लूँ।
सोचा आज इस भागदौड़ के दौर में,
तुमसे तुम्हारी खैरियत पूछी जाए,
तुम्हारे मम्मी-पापा, भाई-बहन,
परिवार की भी तबीयत पूछी जाए।
इतने दिनों से मुलाक़ात नहीं हुई,
तो सोचा, अपनी आवाज़ ही तुम्हें सुना देता हूँ,
तुमने तो याद किया नहीं,
पर मैं ही सही, तुम्हें अपनी याद दिला देता दूँ।
ज़्यादा नहीं, बस इतना कहूँगा,
कि कभी तुम भी अपनी आवाज़ सुना देते।
मिल जाता अगर वक़्त किसी दिन,
तो एक फ़ोन ही सही हमें लगा देते।
अब अगर कहो कि वक़्त ही नहीं था तुम्हें,
तो मुझे हैरत भी नहीं होगी।
जानता हूँ मैं इन उलझनों में,
शायद तुम्हें भी फुर्सत नहीं होगी।
ख़ैर छोड़ो… कहाँ इन गंभीर बातों में वक़्त गँवाना,
ज़िंदगी छोटी है दोस्त, कहाँ इन बातों का बोझ उठाना।
यह सोचकर कि कर लेंगे बात किसी और दिन,
अभी कौन-सी जल्दी पड़ी है।
तुम्हें लगता ज़रूर है कि वक़्त बहुत है,
अभी ज़िंदगी बहुत बड़ी है।
मगर किसे पता फिर उस आवाज़ को
कभी सुन पाने का दोबारा मौका मिले या न मिले,
उस बीते हुए लम्हे में जाने का
झरोखा भी मिले या न मिले।
पर ऐ दोस्त, इस आपाधापी में क्या भरोसा,
कब कौन-सा शख़्स कहाँ गुमनाम हो जाए।
और याद कर लेनाअपने अपनों को,
इससे पहले कि ज़िंदगी की आख़िरी शाम हो जाए…
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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