मैं जिससे इश्क़ करूँ, वो मुझसे इश्क़ करे, ये जरूरी तो नहीं।
उसके ख़्वाबों में हो मेरा भी रह-बसर, ये जरूरी तो नहीं॥
मैंने चाहा उसे इतना, दीवानगी की हद तक।
मेरी चाहत का हो उस पर असर, ये जरूरी तो नहीं॥
उसके हर एक लम्हे, हर एक घड़ी का हिसाब रखा मैंने।
मगर उसे भी हो मेरी खैरों-ख़बर, ये जरूरी तो नहीं॥
कुछ देर उसे गर न देखता, तो तलब सी लग जाती थी।
मैं भी उसे इस क़दर ज़रूरी हूँ, ये ज़रूरी तो नहीं॥
वो मिल जाता इस सफ़र में, तो और ही बात थी।
उसी पर आकर थमे ज़िंदगी की डगर, ये ज़रूरी तो नहीं॥
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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