Tuesday, May 26, 2026

Muqaddar


हाथों तक आया मुक़द्दर, फिर भी सहारा न मिला,

जीत के ठीक किनारे, मुझको किनारा न मिला

रात भर जोड़ता रहा साँसों से टूटी उम्मीद,

सुबह होते ही क़िस्मत से कोई इशारा न मिला


इन राहों ने कई दफ़ा बाँहों में थामा मुझे,

पर मंज़िल का कहीं से भी साफ़ नज़ारा न मिला


भीड़ संग चलते रहे लोग हज़ारों रफ़्ता-रफ़्ता,

दिल से दिल तक पहुँचने वाला कोई प्यारा न मिला


क़िस्मत की हवा में बोए थे हमने कितने उजाले,

शहर-ए-अंधेर में फिर भी ज़रा-सा उजियारा न मिला


सब्र ने थामे रखा टूटते लम्हों की गिरह में,

दर्द से आगे जीने का कोई गुज़ारा न मिला


श्रोत्रिय कहता है—नज़र रख सफ़र की सदा पर,

मौक़ा मुझे मेरी क़िस्मत से अभी दुबारा न मिला


                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय





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Tuesday, May 19, 2026

Ghar achha lagta hai


ना पहाड़ों में जी लगता है, 

ना समंदर में दिल लगता है

मैं औरों से थोड़ा अलग हूँ जनाब, 

मुझे बस अपना घर अच्छा लगता है।


जिंदगी की भीड़ में खुद को खोया नहीं मैंने,

मुझे अब भी अपना सफर अच्छा लगता है।


रात के अंधेरों में लिखता हूँ अक्सर,

मुझे बस मेरा हुनर अच्छा लगता है।


बातों में छुपी खामोशी को पहचान लेता हूँ,

मुझे तेरा जज़्बात इस कदर अच्छा लगता है।


जब से रखा है उसने मोहल्ले में पैर अपना,

तब से मुझे मेरा शहर अच्छा लगता है।


उसकी सहेलियों ने छुपकर बताया है मुझे,

उसे आज भी मेरा इश्क हर नज़र अच्छा लगता है।


तेरे जाने के बाद, अब तन्हाई में मुझे,

इस ज़माने में सिर्फ़ ज़हर अच्छा लगता है।


                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय





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Tuesday, May 12, 2026

Dard


क्या अपना कोई दर्द लिखूं मैं,

क्या अपने जज़्बात लिखूं।

नस-नस में है चुभते काँटे,

कैसे अपने हालत लिखूँ।


अंतर्मन में जलती ज्वाला,

तन शोलो का संचार करे।

पल पल बढ़ती इस अग्नि को,

कैसे सरिता की धार लिखूँ।


मैत्री के इन वृक्षों पर,

सभी फूल मुरझाये है।

इस उजड़े हुए चमन को मैं,

कैसे बगिया गुलज़ार लिखूँ।


धक धक प्रतिपल चलती धड़कन,

धड़कन में किसका नाम लिखूँ।

इस टूटे हुए हृदय से मैं,

कैसे साँसों का हिसाब लिखूँ।


अपने जीवन को अब कैसे,

अनुपम सहज साकार लिखूँ।

अपनी हृदय वेदना को कैसे मैं,

इस जीवन का आधार लिखूँ।


                            ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, May 5, 2026

Wo jo dikha nahi hai Kai Zamane se


वो जो दिखा नहीं है कई जमाने से।

कोई मिला दो उस चाँद को इस परवाने से।


रुपया, ज़मीन, जायदाद जो भी है सब ले जाओ।

बस दिखा दो उसकी एक झलक किसी बहाने से।


कितना है, कैसा है, क्यों है, उनसे इश्क़ ये ना पूछो।

चाहतो की बातो को, तोला नही करते किसी पैमाने से।


वो कसमें, वो वादे, वो बाते उनकी।

अब धुन्दला गयी है दिन के आशियाने से।


इश्क है उनसे ये कहा था, कहा है, कहेंगे हर दिन।

मोहब्बत करने वाले डरते नहीं ज़माने से।


दीदार-ए-यार को तड़पे है बहुत ज़मानों से।

उनसे कहना एक बार तो आ कर मिल ले अपने दीवाने से।


                                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 28, 2026

Mradu kar

अपने म्रदु कर से जब पुष्पों को, शाख से तोड़ती होगी।

तो शाख़ें भी, खुशी में फिर, भवँर को चूमती होगी।


साँस ले कर के जो अपनी, हवाओं को भी महका दे,

हवा भी रोब में तनकर, गगन में घूमती होगी।


नरम पैरों से अपने जब, पानी नहरों का सहला दे,

तो नहरें भी, ख़ुद को दरिया, समझ कर झूमती होगी।


जो गा कर इश्क़ का गाना, सरगमें कोई छेड़ दे,

तो सरगम भी मौज़ में, धुन नई सी बुनती होगी।


सुर्ख होठों से अपने जो, कभी कोई नज़्म कह दे तो।

नज़्म भी रूप गज़लों का, शौक से चुनती होगी।


                                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 21, 2026

Kaun ho tum

यूँ चुपके से दिल मे कर गए दस्तक,

ज़रा बताओ तो कौन हो तुम,


है यह आँखों का धोका कोई,

या झूठा सा कोई ख्वाब हो तुम,


है यह बिन माँगी सी मन्नत कोई,

या अलादीन का खोया चिराग़ हो तुम,


है यह बुजुर्गों का दिया आशीर्वाद कोई,

या इस ज़िद्दी दिल की अरदास हो तुम


है यह जाम से छलका कतरा कोई,

या मैक़दे की पूरी शराब हो तुम,


है यह चाँद सी शीतल किरणे कोई,

या रोशनी से भरा आफताब हो तुम,


ज़हन में उतर मेरे, नींदे भी छीन ली मुझसे,

सच कहूं, हां सच कहूं तो बहुत खराब हो तुम।


                                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 14, 2026

Naa jaane kaun hai wo


ढलती हुई शामों में, शबनम सी बिख़र जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


ना कभी नाम कहा उसने, ना अपना पता बताती है।

ना कभी नाराज़ हुई मुझसे, ना कभी गुस्सा जताती है।


ना कभी कुछ माँगा उसने, ना कभी अपना हक जताती है।

ना कभी सताया मुझको, ना कभी मेरा दिल जलाती है।


मेरे हर सवाल के जवाब में, वो कुछ यूँ नज़रें झुकाती है।

बिन कुछ कहे भी उनकी नज़र, बहुत कुछ कह जाती है।

 

ख़्वाबों में उन्हें देखते हुए, सहर से दोपहर हो जाती है।

कम्बख़्त यही एक वज़ह है, की हमें नींद बहुत आती है।


फिर भी वो हर रात, इस दिल को नई आरज़ू दे जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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