Tuesday, July 14, 2026

Bekhudi

हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि हम इश्क़ से बच जाएंगे... लेकिन जब ये मर्ज़ लगता है, तो इंसान दर्द में भी मुस्कुराता है। एक ऐसे ही आशिक की दास्तान है मेरी ये गज़ल—'बेख़ुदी'


दिल लगाया, लगा कर चले जा रहे हैं, 

दिल दुखाया, दुखा कर चले जा रहे हैं। 


ये अजब है कि हम इश्क़ करते नहीं थे

अब इश्क़ में चोट खा कर चले जा रहे हैं। 


दिल्लगी की राहों पर कांटे बिछे हैं, 

दर्द में मुस्कुरा कर चले जा रहे हैं। 


दिलबरों से मिले हैं सितम ही सितम जो, 

उन्हें माथे चढ़ा कर चले जा रहे हैं। 


नींद में दिख गया जब से साया है उनका, 

ख़्वाब पलकों पे सजा कर चले जा रहे हैं।


थकते नहीं थे याद कर-करके जिसको, 

उसे दिल से भुला कर चले जा रहे हैं। 


कोई शिकवा नहीं है हमें अब किसी से, 

दिल का बोझा उठाकर चले जा रहे हैं।


इश्क़ की महफ़िलों में मिला क्या है 'श्रोत्रिय', 

अपनी हस्ती मिटा कर चले जा रहे हैं।


                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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