इश्क़ में रोने और गिड़गिड़ाने की रवायत अब पुरानी हो गई, हमने बिछड़ने को भी अपनी खुद्दारी का जश्न बना लिया! पेश है एक ग़ज़ल... जिसमें कोई टूटा हुआ आशिक़ नहीं, सिर्फ एक बागी का गुरूर है —
नया आशिक़ मुबारक हो... तुम्हारी ईद हो जाए!
मैं उसके दर पे जाऊँ? ये मेरी तौहीन है साहिब!
मेरी चौखट पे आए वो, तो मुमकिन दीद हो जाए।
कहो उससे कि मेरे रास्ते में अब ना आए वो,
मैं जो लहज़े में ज़रा सी भी बग़ावत ले आऊँ,
मैंने फाड़े हैं तेरे सारे ख़त भरे चौराहे पर,
तेरी चौखट पे मैं रोऊँ? मुझे पागल समझा है!
अपनी खुद्दारी का सौदा करता नहीं 'श्रोत्रिय',
~ किर्तिश श्रोत्रिय
* ताकीद (Taakeed): सख्त हिदायत / Warning
