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Tuesday, September 8, 2026

Aastha Ya Unmad – Shor Aur Shanti Par Kavita | Kirtish Shrotriya

धर्म हो या राजनीति, आजकल हर आयोजन शोर से नापा जाने लग है — पर इस शोर में इंसानियत का सुर कहीं दब जाता है। यह गीत किसी एक धर्म या विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि हर उस आवाज़ के ख़िलाफ़ है जो अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों का चैन छीन ले — क्योंकि सच्ची आस्था मौन में भी उतनी ही गहरी होती है।  


Aastha Ya Unmad Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya


शोर के बाज़ार में अब आस्था खोने लगी,

चीखते लाउडस्पीकरों में शांति रोने लगी।

धर्म हो या राजनीति, कैसा ये उन्माद है?

जो किसी की साँस छीने, वो कहाँ संवाद है?

बंद करो ये हुड़दंग, बंद करो ये नारा,

शोर नहीं, सुकून माँगे ये शहर हमारा।


काँपती हैं दीवारें जब बजता है ये शोर,

नन्हे से मासूम का दिल धड़कता पुरज़ोर।

बूढ़ी आँखों में बची जो नींद थी वो लुट गई,

दर्द से बेहाल माँ की साँस जैसे घुट गई।


किस ख़ुदा को, किस विधाता को सुनाना चाहते हो?

दूसरों का सुख उजाड़ के क्या पाना चाहते हो?

आस्था तो मौन में भी सुन लिया करती सदा,

फिर ये बहरे ढोल लेकर कौन सी है ये अदा?


चाहे मंदिर, चाहे मस्जिद, चाहे कोई द्वार हो,

आवाज़ बस इतनी रहे जो चारदीवारी न पार हो।

रैलियों के नाम पर जो सड़कों पे कोहराम है,

कुर्सियों की भूख का ये शर्मनाक अंजाम है।


जायज़ है उत्सव, जायज़ है हर आस्था, हर नारा,

पर एक दायरे में गूँजे हर सुर, हर इशारा।

ध्वनि की भी सीमा हो, मर्यादा का ध्यान हो,

नागरिक की ज़िंदगी का कुछ तो अब सम्मान हो।


त्याग दो ये कर्कशता, चेतना को अब जगाओ,

भक्ति और विचार को मन के भीतर ही बसाओ।

क़ानून का चाबुक चले, मिले सज़ा भी पूरी,

जो शोर से छीने चैन और नींद करे अधूरी।


सोचो वो शाम कितनी हसीं और पुरसुकून हो,

जब बिन किसी भी शोर के हर इक दुआ कुबूल हो।

अज़ान की मिठास हो या घंटियों की हो पुकार,

मौन में ही खिल उठेगी भक्ति की ये बहार।


ईश्वर तो बस भाव से ही रीझता संसार में,

खो न जाए आदमी इस शोर के व्यापार में।

आओ मिलकर तय करें अब शांति का किनारा,

शोर थमेगा तभी जब जागेगा शहर हमारा। 


                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 21, 2026

Putra Moh – Parenting Par Vyangya Kavita | Kirtish Shrotriya

हर घर में एक धृतराष्ट्र और एक गांधारी छुपे बैठे हैं — जो अपने बच्चे की हर गलती को नज़रअंदाज़ कर, उसे ही सही ठहरा देते हैं। क्या यही अंधा पुत्र-मोह कल एक नए महाभारत की नींव नहीं रखता? महाभारत के प्रतीकों से आधुनिक parenting पर लिखी गई एक तीखी, सोचने पर मजबूर करने वाली कविता।

Putra Moh Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya


हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


एक ही वारिस है घर में, सोने के निवाले खाता है,

शीशा भी वो तोड़ दे गर तो, दोष हवा का आता है।

"मेरा बच्चा गलत नहीं", ये घर-घर की लाचारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


गलती को भी सही बताया, सारे सबक भुला बैठे,

ज़िद को उसकी प्यार समझकर, सिर पर उसे बिठा बैठे।

कल का बालक आज बना है, दुर्योधन अवतारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


स्कूल में टीचर ने जो टोका, तो उनसे ही लड़ बैठे,

"ग़लती औरों की होगी", बस इसी बात पर अड़ बैठे।

शिक्षा के मंदिर में करते, अंधों सी तरफदारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


मेहनत की कोई कद्र नहीं, सब बैठे-बैठे पाना है,

बाप की दौलत के दम पर, बस अपना रौब जमाना है।

बड़ों का कोई मान नहीं है, ये कैसी ज़िम्मेदारी है?

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


सुख-सुविधा के नाम पे तुमने, उसको बस अभिमान दिया,

अच्छी शिक्षा भूल गए, बस दौलत का ही ज्ञान दिया।

कल जब तुमको छोड़ चलेगा, तब रोने की बारी है,

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


आंखों पर है पट्टी बाँधी, सच से मुंह को मोड़ लिया,

गलत-सही का हर तराज़ू, अपने हाथों तोड़ दिया।

आज तुम्हारे ही आंगन में, महाभारत की बारी है

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।

त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।


                                                     ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Saturday, January 12, 2019

Ye Kaun Sa Desh Hain – Women Safety Kavita | Kirtish Shrotriya

जहाँ स्त्री को देवी माना जाता है, वहीं उसकी सुरक्षा पर सवाल क्यों उठते हैं? महिला सुरक्षा पर एक तीखा और ज़रूरी सवाल।



महिलाओं पर जहाँ अत्याचार तुम दिन रात करते हो।

ये कौन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।


जिन नो दिनों में देवी मान कर पूजते हो जिसे, 

उन दिनों में भी अपनी गन्दी नज़रों से उसका शिकार करते हो।

ये कौन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।


रात को घर से निकलने से जहाँ डरती है औरते,

वहाँ उनके पहनावे मात्र से ही उनके करैक्टर पर सवाल करते हो।

ये कौन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।


जहाँ श्री कृष्ण ने प्रेम की पवित्रता का वर्णन किआ है, 

वहाँ तुम अपनी गंदी वासनाओ को भी प्रेम का नाम देते हो।

ये कौंन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।


नन्हीं सी बच्ची जो लक्ष्मी और सरस्वती का रूप मानी जाती है, 

उसकी मासूमियत से भी तुम इस तरह खिलवाड़ करते हो।

ये कौंन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।


औरत जहाँ शांति और समृद्धि का प्रतिक मानी जाती है,

फिर क्यों उन्हें घिनौनी हरकत कर बेबस और लाचार करते हो।

ये कौंन सा देश है जिसके उत्थान की तुम बात करते हो।।

                                                         

                                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Wednesday, March 8, 2017

Hum Kahan Ja Rahe Hain – Women's Day Kavita | Kirtish Shrotriya

साल के 364 दिन ज़ुल्म, और सिर्फ़ 1 दिन सोशल मीडिया पर महिला दिवस का दिखावा — क्या यही है असली सम्मान? समाज की दोहरी सोच पर एक करारा सवाल।


364 दिन महिलाओं पर ज़ुल्म करने वाले लोग,

आज 1 दिन फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर चिल्ला-चिल्ला कर महिला दिवस मना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


बेटियों को मार रहे कोख में, 

और बेटों के पैदा होने पर जश्न मना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


जहाँ एक तरफ साक्षी, सिंधु, साइना, सानिया की जीत का जश्न मना रहे हैं, 

पर अपनी बहू-बेटी के घर से बाहर निकलने में भी ऐतराज़ जता रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,

अपनी बहन को कोई आँख उठा कर देख भी ले तो खून खौल उठता है, 

और दूसरों की माँ-बहनों को एसिड से जला रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


अपने बेटों को इंच भर तकलीफ भी हो तो दर्द होता है, 

पर अपनी ही बहुओं को दिन भर ताने सुना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


लड़के आधी रात में भी सड़कों पर लड़की छेड़ आएं तो भी शरीफ़ हैं, 

पर लड़की के थोड़े से छोटे कपड़े देख कर उसका कैरेक्टर ढीला बता रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


घरों में सुख-समृद्धि, खुशियाँ लाती हैं औरतें, 

पर चंद रुपयों के लिए उन्हें भी जिंदा जला रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


एक पल में झाँसी की रानी तो अगले ही पल में सती सावित्री है औरत, 

अगर मौका मिले तो प्रतिभा पाटिल बन पूरा देश चला सकती है औरत, 

ये सब कुछ जान कर भी जो अंजान बने जा रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं, ना जाने हम.....


                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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