Tuesday, October 6, 2026

Ram Bhi Main, Ravan Bhi Main – Prem Ke Dwand Par Kavita | Kirtish Shrotriya

हम सब किसी न किसी के लिए राम हैं, और किसी के लिए रावण। प्रेम में अक्सर लोग सिर्फ़ उजाला माँगते हैं, पर जो सच में अपनाता है, वह अँधेरा भी साथ लेता है। यह कविता एक ऐसे प्रेमी की आवाज़ है जो अपनी हर परत के साथ स्वीकार किए जाने की माँग करता है, और अंत में यह भरोसा भी देता है कि अँधेरे के बाद वही रोशनी भी बनेगा।

Ram Bhi Main, Ravan Bhi Main Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya

मैं ही आदि और मैं ही अंत, 

मैं ही भटका हुआ वसंत। 

तुझमें जो उठता है संशय, 

मैं ही उस संशय का निश्चय।


हाँ, मैं ही तेरा राम प्रिये, 

और मैं ही तेरा रावण हूँ!

मैं प्यास जगाता तप्त आषाढ़, 

मैं तृप्त भिगोता सावन हूँ।


मुझमें गंगा का शीतल सार, 

मुझमें ही ज्वाला का अंगार। 

जिस पाषाण को तूने पूजा, 

उस मूरत के प्राण भी मैं, 

जिसने तेरी आत्मा बींधी, 

उस प्रत्यंचा का बाण भी मैं।


तू सुर की देवी बन बैठी, 

मैं उसका बिखरा सरगम हूँ, 

मत खोज मुझे तू एक छोर, 

मैं दोनों तट का संगम हूँ। 


पुण्य जगे तो कौशल्या-नंदन, 

क्रोध उठे तो लंका का क्रंदन।

मैं छल भी हूँ, मैं सत्य भी हूँ, 

अधरों पर मौन, मैं कथ्य भी हूँ। 

मैं उत्तर, मैं प्रतिवाद भी हूँ, 

ख़ामोशी का मैं अनुवाद भी हूँ।


छोड़ सभी असमंजस अपने, आ मेरे दोनों रूप समेट, 

फूलों का ही मोह न रख तू, काँटों की भी सेज लपेट। 

मुझसे ही तेरी हर सुबह, 

मुझसे ही हर शाम प्रिये,

मैं ही तेरी पहली मंज़िल, 

मैं ही अंतिम धाम प्रिये!


                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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