हर घर में एक धृतराष्ट्र और एक गांधारी छुपे बैठे हैं — जो अपने बच्चे की हर गलती को नज़रअंदाज़ कर, उसे ही सही ठहरा देते हैं। क्या यही अंधा पुत्र-मोह कल एक नए महाभारत की नींव नहीं रखता? महाभारत के प्रतीकों से आधुनिक parenting पर लिखी गई एक तीखी, सोचने पर मजबूर करने वाली कविता।
हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
एक ही वारिस है घर में, सोने के निवाले खाता है,
शीशा भी वो तोड़ दे गर तो, दोष हवा का आता है।
"मेरा बच्चा गलत नहीं", ये घर-घर की लाचारी है,
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
गलती को भी सही बताया, सारे सबक भुला बैठे,
ज़िद को उसकी प्यार समझकर, सिर पर उसे बिठा बैठे।
कल का बालक आज बना है, दुर्योधन अवतारी है,
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
स्कूल में टीचर ने जो टोका, तो उनसे ही लड़ बैठे,
"ग़लती औरों की होगी", बस इसी बात पर अड़ बैठे।
शिक्षा के मंदिर में करते, अंधों सी तरफदारी है,
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
मेहनत की कोई कद्र नहीं, सब बैठे-बैठे पाना है,
बाप की दौलत के दम पर, बस अपना रौब जमाना है।
बड़ों का कोई मान नहीं है, ये कैसी ज़िम्मेदारी है?
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
सुख-सुविधा के नाम पे तुमने, उसको बस अभिमान दिया,
अच्छी शिक्षा भूल गए, बस दौलत का ही ज्ञान दिया।
कल जब तुमको छोड़ चलेगा, तब रोने की बारी है,
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
आंखों पर है पट्टी बाँधी, सच से मुंह को मोड़ लिया,
गलत-सही का हर तराज़ू, अपने हाथों तोड़ दिया।
आज तुम्हारे ही आंगन में, महाभारत की बारी है
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
हर बाप बना धृतराष्ट्र यहां, हर मां दिखती गांधारी है।
त्रेता से कलयुग तक लेकर, पुत्र मोह ही भारी है।।
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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