वो आधी रात के फ़ोन कॉल्स, वो बेवजह का पागलपन — क्या उम्र के साथ रिश्ते सच में सिमट कर सिर्फ़ 'Stories' और 'Status' तक रह जाते हैं? बड़े होने की क़ीमत पर एक ईमानदार, दिल को छू लेने वाली स्पोकन वर्ड कविता।
वो आधी रात के 'Midnight Calls' अब नहीं आते,
घर के बाहर वो केक वाले सरप्राइज़ अब नहीं आते।
अज़ीज़-ओ-ख़ास हुआ करते थे जो लोग कभी हमारे,
अब उनके स्टेटस पर मेरे 'Reply' तक नहीं आते।
उम्र बढ़ने लगी, तो लोग बिछड़ने लगते हैं,
सब अपनी-अपनी ज़िंदगी के कामकाज में उलझने लगते हैं।
जो कभी हमारी एक आवाज़ पर दौड़े चले आते थे,
अब वो वक़्त ना होने के नए-नए बहाने गढ़ने लगते हैं।
धीरे-धीरे हर एक मुलाकात अब 'Planned' होने लगती है,
ज़िंदगी 'Screen' के एक छोटे से दायरे में सिमटने लगती है।
ख़ुशियाँ अब महफ़िलों में नहीं, बस 'Stories' पर दिखती हैं,
और दूर से मुबारकबाद देने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है।
ना अब कोई रूबरू होकर गले लगाने आता है,
ना हक़ से कोई गालियों वाला प्यार जताने आता है।
ये दूर बैठकर जो सोशल मीडिया की रस्में निभाते हैं,
सच कहूँ... अब जन्मदिन में वो पहले वाला मज़ा नहीं आता है।
अब ना वो 'Birthday Bumps' बचे हैं, ना वो पार्टियां पुरानी हैं,
बस एक शांत से डिनर में बैठकर, सारी समझदारी दिखानी है।
बहुत याद आता है वो पागलपन, जो दोस्तों के होने से था,
आज समझ आया... कि ये 'Maturity' भी कितनी झूठी कहानी है।
दिल करता है कि काश वो पुराने दिन फिर से लौट आएं,
हम फिर से बेवजह, बेफिक्र होकर मुस्कुराएं।
ये ज़िम्मेदारियों का चश्मा, काश थोड़ी देर को उतर जाए,
यार... क्यूं इतने बड़े हो गए हम? चलो फिर से बच्चे बन जाएं।
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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