Tuesday, September 1, 2026

Khuddari – Ghurur Wali Ghazal | Kirtish Shrotriya

इश्क़ में रोने और गिड़गिड़ाने की रवायत अब पुरानी हो गई, हमने बिछड़ने को भी अपनी खुद्दारी का जश्न बना लिया! पेश है एक ग़ज़ल... जिसमें कोई टूटा हुआ आशिक़ नहीं, सिर्फ एक बागी का गुरूर है — 



हमारे लौटने की ना कोई उम्मीद हो जाए, 
नया आशिक़ मुबारक हो... तुम्हारी ईद हो जाए!

मैं उसके दर पे जाऊँ? ये मेरी तौहीन है साहिब!
 मेरी चौखट पे आए वो, तो मुमकिन दीद हो जाए।

कहो उससे कि मेरे रास्ते में अब ना आए वो, 
मेरी तरफ से उसको आखिरी ताकीद* हो जाए!

मैं जो लहज़े में ज़रा सी भी बग़ावत ले आऊँ, 
तो ये ख़ामोश सा सारा शहर मेरा मुरीद हो जाए!

मैंने फाड़े हैं तेरे सारे ख़त भरे चौराहे पर, 
जा, ये तमाशा ही तेरी मुहब्बत की रसीद हो जाए!

तेरी चौखट पे मैं रोऊँ? मुझे पागल समझा है! 
मैं वो आशिक़ हूँ जो हंसते हुए शहीद हो जाए।

अपनी खुद्दारी का सौदा करता नहीं 'श्रोत्रिय', 
ये तेरा वहम है कि कौड़ियों में ख़रीद हो जाए!

                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय



* ताकीद (Taakeed): सख्त हिदायत / Warning



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