Tuesday, April 14, 2026

Naa jaane kaun hai wo


ढलती हुई शामों में, शबनम सी बिख़र जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


ना कभी नाम कहा उसने, ना अपना पता बताती है।

ना कभी नाराज़ हुई मुझसे, ना कभी गुस्सा जताती है।


ना कभी कुछ माँगा उसने, ना कभी अपना हक जताती है।

ना कभी सताया मुझको, ना कभी मेरा दिल जलाती है।


मेरे हर सवाल के जवाब में, वो कुछ यूँ नज़रें झुकाती है।

बिन कुछ कहे भी उनकी नज़र, बहुत कुछ कह जाती है।

 

ख़्वाबों में उन्हें देखते हुए, सहर से दोपहर हो जाती है।

कम्बख़्त यही एक वज़ह है, की हमें नींद बहुत आती है।


फिर भी वो हर रात, इस दिल को नई आरज़ू दे जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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