कई अरसे से ढूंढ रहा हूँ शख़्सियत अपनी,
ना जाने इस वक़्त मैं कौन से शहर में हूँ ,
मैं अपनी ही सोच के अगर-मगर में हूँ,
शायद मैं एक दुनिया से दूसरी दुनिया के सफर में हूँ,
जिसे सुन कर भी अनसुना नहीं कर पाते है लोग अक्सर,
आज तो मैं उसी अनचाही सी खबर में हूँ,
कल तक खटकता था तिनका बन कर जिनकी आँखों में मैं,
देखो आज में उन सभी लोगो की नज़र में हूँ,
कोई बुझा दो रात के इन जलते चिरागों को जा कर,
आज मैं अपनी नई जिंदगी की, नई सहर में हूँ,
अब तक लगता था मुझे दुश्मनों के दिमाग में है घर मेरा,
अपने दोस्तों के तो में हमेशा से जिगर में हूँ,
बहुत अँधेरा सा दिखाई दे रहा है मुझे चारो तरफ अपने,
अरे लगता है, मैं अपने ही लोगो की खोदी हुई कबर में हूँ ।।
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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