दो पल सुकून की तलाश में ही तो भटकते थे ना रात दिन,
अब मिला है सुकून, तो कुछ दिन इसमें भी बिता कर तो देखिए।।
थक कर सोने पर तो बस, अंधेरा ही दिखता था निंदो में,
अब है वक्त तो ख्वाबों की माला में, अपने भी सपने पिरो कर तो देखिए।।
दीवारों को कान होते हैं यह तो सुना था मगर,
क्या पता बोल उठे दीवारें, कुछ गप्पे इन से भी लड़ा कर भी तो देखिए।।
काम ही काम किया जिंदगी में, अपने लिए वक्त कहां,
अब कुछ ध्यान अपनी सेहत पर भी, लगा कर तो देखिए।।
बहुत से किस्से, कहानियां, कारनामे सुनने मिलेंगे तुमको,
कभी साथ बैठकर अपनों के, कुछ पल बातें करके तो देखिए।।
यूं तो हर रोज नई शख्सियत से तार्रुफ होता रहा मगर,
अब ज़रा खुद से भी रूबरू हो कर तो देखिए।।
शायद बढ़ चुकी हो दूरियां, वक्त की कमी से कुछ रिश्तों में कभी,
यही समय है फोन उठाइए और उनके नंबर लगा कर तो देखिए।।
गर दिया है कुछ वक्त जिंदगी ने तुम्हें,
तो इस वक्त में खुद को बदल कर तो देखिए ।।
~ किर्तिश श्रोत्रिय
nice 👍
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