ना जाने क्यों कुछ अजनबी चेहरे भी अपने से लगने लगते हैं, और उनके सामने आते ही सारे लफ्ज़ गुम हो जाते हैं। एक अनकहे, अनजाने से इश्क़ की गहरी दास्तान।
ना जाने क्यों आज कुछ लिखने को मन करता है,
ना जाने क्यों कभी-कभी कोई अजनबी भी अपना सा लगता है।
ना जाने क्यों उसकी हर बात हमें अच्छी लगने लगती है..
कभी-कभी सोचते हैं कहें बहुत कुछ उनसे..
पर उनके सामने आते ही अल्फ़ाज़ भी गुम से हो जाते हैं..
ना जाने ऐसा क्या है उनमें जो हर दिन, हर पल उन्हें देखने को जी करता है..
क्यों उनको ना देखूँ तो दिन भी अच्छा नहीं गुज़रता है..
ना जाने क्यों दिल में हज़ारों ख़्याल से आने लगते हैं..
ना जाने क्यों बस slow songs ही दिल को भाने लगते हैं..
दिन के उजालों से रात के अंधेरों तक बस कुछ अच्छा नहीं लगता..
उनके सिवा दुनिया में कोई भी सच्चा नहीं लगता, ना जाने क्यों..
ना जाने कितने ही अल्फ़ाज़ लबों पर आ कर थमने लगते हैं..
जब शब्द गुम से हो जाते हैं और नैना बातें करने लगते हैं, ना जाने क्यों ..
ना जाने क्यों लगता है जब उनके साथ होता हूँ तो वक़्त ठहर सा जाए..
घड़ी की सुइयाँ रुक जाएँ.. दुनिया वाले कहीं खो जाएँ..
बस रह जाएँ तो वो और मैं, ना जाने क्यों.. ना जाने क्यों..
~ किर्तिश श्रोत्रिय
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