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Tuesday, May 19, 2026

Ghar Achha Lagta Hai – Sadagi Kavita | Kirtish Shrotriya

न पहाड़ों में सुकून, न समंदर में दिल — फिर भी अगर कहीं चैन मिलता है, तो अपने ही घर में। सादगी और अपनेपन की एक दिलचस्प कविता।

Ghar Achha Lagta Hai Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya

ना पहाड़ों में जी लगता है, 

ना समंदर में दिल लगता है

मैं औरों से थोड़ा अलग हूँ जनाब, 

मुझे बस अपना घर अच्छा लगता है।


जिंदगी की भीड़ में खुद को खोया नहीं मैंने,

मुझे अब भी अपना सफर अच्छा लगता है।


रात के अंधेरों में लिखता हूँ अक्सर,

मुझे बस मेरा हुनर अच्छा लगता है।


बातों में छुपी खामोशी को पहचान लेता हूँ,

मुझे तेरा जज़्बात इस कदर अच्छा लगता है।


जब से रखा है उसने मोहल्ले में पैर अपना,

तब से मुझे मेरा शहर अच्छा लगता है।


उसकी सहेलियों ने छुपकर बताया है मुझे,

उसे आज भी मेरा इश्क हर नज़र अच्छा लगता है।


तेरे जाने के बाद, अब तन्हाई में मुझे,

इस ज़माने में सिर्फ़ ज़हर अच्छा लगता है।


                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय





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Sunday, June 24, 2018

Ek Benaam Rishta – Unspoken Love Kavita | Kirtish Shrotriya

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें कोई नाम नहीं दिया जा सकता, फिर भी दिल में गहरी जगह बना लेते हैं। एक अनकहे रिश्ते की गहरी दास्तान।



एक अजनबी अनजाना सा रिश्ता होता है

जिसे हम हर किसी को चंद शब्दों में बता नहीं सकते,

हम तो समझते है पर किसी को समझा नहीं सकते,

लगता है कौन समझेगा हमारी इन बातो को,


रात के अँधेरे में सबसे छुप कर व्हाट्सप्प पर उनसे की हुई उन बातो को,

हर उस पल को जो हमने उसके साथ बिताया था,

हर उस ख्वाब को जो उसके साथ सजाया था,

हर उस पल में जब महसूस किया उसे,

हर वो घडी में जब दिल ने याद का उसे,


हर वो दिन बिलकुल भी अच्छा नहीं गुजरता,

जिस दिन उनसे मेरी बात नहीं होती,

और मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता, 

जब बहुत कोशिशों के बाद भी उनसे मुलाकात नहीं होती,


मगर सबकी तकदीरो में वो प्यार नहीं होता,

हर साथ देखा सपना साकार नहीं होता,

हर दिन रिश्ते में आती हज़ारो मुसीबते,

और फिर उन मुसीबतो का हमारे पास जवाब नहीं होता, 


ना मिल पाते ना बिछड़ पते है अजीब सी कश्मकश होती है, 

दिल और दिमाग की यही आ कर तो एक जंग होती है, 

दिल कुछ कहता है दिमाग कुछ और, 

नहीं समझ आता किसकी सुने और किसे करे ignore,


ये दिल और दिमाग की जुंग तो बरसो पुरानी है, 

इसे न आज तक कोई समझ पाया है सब कुछ जानते समझते हुए भी, 

ये दिमाग न कभी दिल से जीत पाया है,

ये बाते जान समझ करने क बाद तो हम भी कुछ नहीं कर सकते थे, 

तो छोड़ दिए उस रिश्ते को खूबसूरत से मोड़ पर ला कर,

जिसे हम कोई नाम नहीं दे सकते थे..!!


                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Wednesday, February 1, 2017

Pyaar Kya Hai – Pyaar Ki Paribhasha | Kirtish Shrotriya

प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि माँ का दुलार, भाई-बहन का रिश्ता और सैनिक के इंतज़ार जैसा भी होता है। प्यार की गहरी परिभाषा तलाशती एक कविता।


“प्यार क्या है..?”


प्यार तपस्या और साधना की अनुभूति है,
प्यार समंदर से मिलने वाला मोती है,

प्यार राधा है, रुक्मिणी है, शेषनाग है,
प्यार गोकुल की गलियों में कान्हा का रास है,

प्यार शबरी के बेर और मीरा का विश्वास है,
प्यार कैकेयी के कह देने पर राम का वनवास है,

प्यार माँ का बेटे से दुलार है,
प्यार पिता का दिया अतुलित संसार है,

प्यार भाई की कलाई पर बहन की राखी है,
प्यार गलती न होने पर भी माँगी गई माफ़ी है,

प्यार दादी की बनाई मक्के की रोटी, सरसों का साग है,
प्यार बड़े-बुजुर्गों का दिया आशीर्वाद है,

प्यार देश की सीमा पर लड़ रहे सैनिक के लिए किया इंतज़ार है,
प्यार पत्नी का पति के लिए किया गया श्रृंगार है,

प्यार आँखों ही आँखों में की हुई बातें हैं,
प्यार विरह में बितायी गई लंबी रातें हैं,

प्यार स्त्री के मस्तक पर लगा सिंदूर है, टीका है, लाली है,
प्यार कानों में पहनी हुई बाली है,

प्यार पायल है, बिछिया है, साड़ी है,
प्यार घूँघट में बैठी हुई घराड़ी है,

प्यार छोटी-मोटी नोक-झोंक और मीठी सी लड़ाई है,
प्यार प्रेमिका की गोद में सर रख ली हुई अंगड़ाई है,

प्यार एक दूजे के लिए खाई कसमें हैं, वादे हैं,
प्यार दिलों में जगते नेक इरादे हैं,

प्यार कभी पूर्णिमा तो कभी अमावस की रात है,
प्यार करवाचौथ पर किया हुआ उपवास है,

प्यार जैसे दिया और बाती का साथ है,
प्यार जन्म-जन्म के लिए माँगा हमसफ़र का हाथ है,

प्यार शुरुआत है, प्यार ही अंत है, 

प्यार से ही यह सृष्टि और प्यार ही अनंत है


प्यार जीवन की अनमोल पूँजी है,
प्यार ही तो सफलताओं की कुंजी है।

                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Wednesday, March 12, 2014

Wo Bachpan Ke Din – Childhood Nostalgia Kavita | Kirtish Shrotriya

ना GF की चिंता थी, ना फ्यूचर की — बस मिट्टी के खिलौने और दादी की कहानियाँ थीं। बचपन की मासूम यादों को समेटती एक प्यारी नॉस्टैल्जिक कविता।


वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे, 

जहां वो हमारे मिट्टी के आशियाने थे,


खेल और खिलौनों की दुनिया बड़ी प्यारी थी, 

दादी का प्यार और नानी की कहानी थी, 

ना GF कि चिंता, ना फ्यूचर के ठिकाने थे, 

वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे,


पैसे थोड़े कम, पर पक्की अपनी यारी थी, 

२-२ रुपए में भी हमको तो पार्टी माननी थी, 

जहां स्कूल की मस्ती और दोस्तों के ताने थे, 

वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे,


बस हम ही हम थे सच्चे, और झूठी दुनियादारी थी, 

बस चार दोस्तों में बसती, अपनी दुनिया सारी थी, 

छोटी आंखो में बसते, वो सपने कितने सुहाने थे, 

वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे,


क्या ख़ूबसूरत थे दिन, क्या ख़ूबसूरत जमाने थे, 

वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे,

वो बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे।।


                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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