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Tuesday, October 13, 2026

Phir Bhi - Muktak Mala | Kirtish Shrotriya

कुछ मोहब्बतें मुकम्मल न होकर भी रूह में ताउम्र ज़िंदा रहती हैं।  यह मुक्तक माला 'फिर भी' उसी बेइंतहा चाहत, इंतज़ार और खामोश वादों की एक भावुक दास्तान है—जहाँ पाने की कोई शर्त नहीं, बस बेपनाह प्यार है।

Phir Bhi — Hindi Mukatakk Mala by Kirtish Shrotriya

बंद आँखों से महफ़िल सजाता हूँ मैं,
हर दुआ में उसी को बुलाता हूँ मैं,
वो हक़ीक़त में मेरी भले हो न हो,
अपने ख़्वाबों में उसको ही पाता हूँ मैं।

जो लिखा भी नहीं वो सुनाता हूँ मैं,
गीत तेरी ही चाहत में गाता हूँ मैं,
हाँ पता है तू मेरी ना होगी मगर,
फिर भी तेरी गली को ही आता हूँ मैं।

मुस्कुराहट का पर्दा चढ़ाता हूँ मैं,
अश्क आँखों के सबसे छुपाता हूँ मैं,
मेरी तक़दीर में जब वो शामिल नहीं,
फिर भी हाथों की रेखा मिलाता हूँ मैं!

एक दिया सा हर शाम में जलाता हूँ मैं,
राह में उसकी, पलकें बिछाता हूँ मैं,
वो न आएगी अब, ये ख़बर है मगर,
फिर भी दहलीज़ पर लौ बढ़ाता हूँ मैं।

सर्द रातों में ख़ुद को जलाता हूँ मैं,
उसकी चाहत में ख़ुद को भुलाता हूँ मैं,
वो किसी और की हो चुकी है तो क्या...
अपने हिस्से का वादा निभाता हूँ मैं!

                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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