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Tuesday, September 29, 2026

Wo Kunwaare Din – Beparvaah Zindagi Ki Yaadein | Kirtish Shrotriya

कभी ज़िंदगी में एक ऐसा भी दौर था जब न घड़ी की फिकर थी, न कल की — बस अपनी मर्ज़ी और आधी रात की मैगी थी। ये गीत उन्हीं बेफ़िक्र कुँवारे दिनों की एक याद है, जो अब ज़िम्मेदारियों की भीड़ में कभी-कभार ही लौट कर आती है।

बेफ़िक्री का ताज — Kirtish Shrotriya की हिंदी कविता, जिसमें कुंआरे दिनों की आज़ादी, दोस्ती, मैगी और पुरानी यादों को दर्शाया गया है।

ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


एक कुर्सी पे हफ़्तों से कपड़े पड़े, हम नहाने के मुद्दे पे खुद से अड़े।

ना सलीके की कोई भी ज़ंजीर थी, अपनी मर्ज़ी के हम बादशाह बड़े।

दोपहरी तलक आँख खुलती न थी, बस अँधेरे में बजता वो एक साज़ था

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


जेब में चंद सिक्के भले ही रहे, पर हवाओं पे अपनी सवारी रही।

चाय की गुमटियों पे वो गपशप चली, दोस्तों में भी चलती उधारी रही।

कोई मंज़िल नहीं, बस सफ़र चाहिए, हर रास्ते पे अपना ही राज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


रात के दो बजे जब भी भूख लगी, गैस चूल्हे पे मैगी पकाया किए।

कल की चिंता को चादर में अपनी लपेटे, बेवजह ही ठहाके लगाया किए।

ना कमाने की फ़िकर, ना घर का तनाव, हर दिन जैसे अपना ही आग़ाज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


बिस्तर अब तो सलीके से सजने लगे, अब करीने से जीने की आदत लगी।

वो जो बिखरा-सा लड़का था, गुम हो गया, ज़िम्मेदारियों की अब तो चाहत जगी।

याद आती है फिर भी वो आवारगी, वो अपना पुराना-सा अंदाज़ था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी, सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


ना घड़ी की फ़िकर, ना कैलेंडर का डर, ज़िंदगी का अलग ही मिज़ाज था।

वो कुंआरे दिनों की भी क्या बात थी...सिर पे बस बेफ़िक्री का ताज था।


                                                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, September 15, 2026

Thoda Thehar Ja – Zindagi Ki Raftar Par Kavita | Kirtish Shrotriya

स्क्रीन में सिमटी ज़िंदगी, स्वाइप होता इश्क़, और रातों-रात शोहरत की चाहत — क्या हम सब जल्दी में इतना कुछ खो नहीं रहे? ये कविता एक ठहराव की सलाह है, उस पीढ़ी के लिए जिसे सब कुछ 'इंस्टेंट' चाहिए।

Thoda Thehar Ja Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya

हर साँस में है भाग-दौड़, हर आँख में इक होड़ है, 

किस मोड़ पर पहुँचेगा तू, ये कैसी अंधी दौड़ है?

लोकल की उस भीड़ में भी, हर शख़्स यहाँ अकेला है, 

कानों में इयरफ़ोन लगे, आँखों में ख़ुद का मेला है।


चाहत भी अब 'स्वाइप' हुई, और भूख भी 'ऑर्डर' पर, 

सिकुड़ गई दुनिया सारी, बस मोबाइल के बॉर्डर पर।

तीन घंटे की फ़िल्म भारी, सब्र नहीं अब आँखों में, 

पूरी रातें कट जाती हैं, तीस सेकंड के झाँसों में!


'सीन' हुए पैग़ाम पड़े हैं, बातों का कोई मोल नहीं, 

एक मेज़ पर बैठे दो दिल, लेकिन कोई बोल नहीं।

पास ज़रूर बैठे हैं मगर, छूता कोई अहसास नहीं, 

आँखें बस स्क्रीनों पर गड़ी हैं, कोई किसी के पास नहीं।

अब इश्क़ भी है फ़ास्ट-फ़ूड सा, बस आदतों का नाम है, 

सुबह मिले और शाम जुदा, ये कैसा नया मुकाम है?


मेहनत तुझको रास नहीं, बिना नींव इमारत भाती है, 

रातों-रात उठे जो शोहरत, बस वो ही चाहत आती है।

पर याद रख, जो पल में बना, वो पल भर में बर्बाद है, 

बुलबुले सी उम्र है उसकी, जिसे तू समझता बुनियाद है।


ये अटल नियम कुदरत का है, वक़्त रहते तू जान ले, 

बिना जड़ों के जो पनपा, उसका गिरना तू मान ले।

जिस पेड़ ने न सब्र से, अपनी जड़ों को गाड़ा है, 

उसे वक़्त की इक हल्की सी, आँधी ने पछाड़ा है।


तो थोड़ा ठहर, कुछ वक़्त दे, जड़ों को ज़मीं में उतरने दे, 

इस बेतहाशा ज़िंदगी को, ज़रा अपनी चाल से चलने दे।

रिश्तों को भी साँसें दे, जज़्बातों को भी ढलने दे, 

जो आग जला दी है दिल में, उसे धीमी आँच पे जलने दे।


क्यूँकि... 

जो हर चीज़ जल्दी में पा गया, वो अंत में सब हारता है, 

और जो सब्र से सींचा जाए, वो वक़्त को भी मारता है!

   

                                                          ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, August 25, 2026

Jaruri Hai – Zindagi Par Hindi Nazm | Kirtish Shrotriya

कम्फर्ट ज़ोन और पुरानी यादें सुकून तो बहुत देती हैं, लेकिन वहीं ठहर जाना ज़िंदगी नहीं। कुछ मंज़िलें पाने के लिए कुछ जगहों, कुछ रिश्तों और कुछ एहसासों से निकलना ज़रूरी होता है। अगर आप भी किसी बदलाव के इंतज़ार में हैं, तो शायद ये नज़्म आपके लिए है।

Jaruri Hai Hindi Nazm by Kirtish Shrotriya


किसी का किसी से मिलना ज़रूरी है, किसी का किसी से बिछड़ना ज़रूरी है,
ज़िंदगी में कहीं तक पहुँचने के लिए, कहीं से निकलना ज़रूरी है।


चाँद की झलक के इंतज़ार में तड़पते, उस बावरे चकोर से पूछो, 

उस मिलन से पहले, चढ़ते सूरज का हर शाम ढलना ज़रूरी है।


एक अरसे से ख़ामोश बैठे, उस मोर को फिर से नचाने के लिए, 

आसमान में इन काली घटाओं का, झूम कर मचलना ज़रूरी है।


ये छोटी-छोटी ठोकरें यूँ ही नहीं लगतीं, ज़िंदगी के इस सफ़र में, 

इसमें हर बार गिरकर टूटना, और टूटकर संभलना ज़रूरी है।


यूँ ही नहीं मिलती पहचान किसी को, इस भीड़ भरे ज़माने में, 

सोने को भी कुंदन बनने ख़ातिर, तपती आग में जलना ज़रूरी है।


ठहर गए एक ही दर्द सीने से लगाकर, तो ज़िंदगी कैसे जियोगे 'श्रोत्रिय'? 

नदियों सा बेबाक बहने को, पुरानी यादों की बर्फ़ का पिघलना ज़रूरी है।


                               

                                                                       ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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