Sunday, April 22, 2018

Maine Waqt Badalte Dekha hai

पैसों की चमक में सच्चे रिश्ते और वफ़ा भी बिक जाते हैं देखा है। वक़्त की बदलती चाल पर एक गहरी और सच्ची कविता।


मेने तूफानों को साहिलो पर ठहरते देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


मेने दिन के उजालो को, रात के अँधेरे में बदलते देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


मेने हर दिल अजीज़ लोगो को भी, एक पलभर में बिछड़ते हुए देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


चंद रुपयों के लालच में, अपनों को अपनों से झगड़ते हुए देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखे है..


एक सत्ता की कुर्सी के आगे, अच्छे अच्छों का ईमान सड़क पर बिकते हुए देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


बाज़ारो में बड़ी बड़ी साख़ रखने वालो को, पल में राख़ होते देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


अपनी दौलत पर गुरुर करने वाले को भी एक दिन, पाई पाई का मोहताज होते हुए देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


मेने सच्ची मोहब्बत को भी, दौलत के तराज़ू में तोलते हुए देखा है.. 

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..


मेने तूफानों को साहिलो पर ठहरते देखा है..

हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है..

हाँ मेने इस छोटे से वक़्त में बहुत कुछ देखा है.. !!


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Saturday, March 24, 2018

NAA JAANE KYUN..?

ना जाने क्यों कुछ अजनबी चेहरे भी अपने से लगने लगते हैं, और उनके सामने आते ही सारे लफ्ज़ गुम हो जाते हैं। एक अनकहे, अनजाने से इश्क़ की गहरी दास्तान।


ना जाने क्यों आज कुछ लिखने को मन करता है, 

ना जाने क्यों कभी-कभी कोई अजनबी भी अपना सा लगता है।


ना जाने क्यों उसकी हर बात हमें अच्छी लगने लगती है.. 

कभी-कभी सोचते हैं कहें बहुत कुछ उनसे.. 

पर उनके सामने आते ही अल्फ़ाज़ भी गुम से हो जाते हैं..


ना जाने ऐसा क्या है  उनमें जो हर दिन, हर पल उन्हें देखने को जी करता है.. 

क्यों उनको ना देखूँ तो दिन भी अच्छा नहीं गुज़रता है..


ना जाने क्यों दिल में हज़ारों ख़्याल से आने लगते हैं.. 

ना जाने क्यों बस slow songs ही दिल को भाने लगते हैं..


दिन के उजालों से रात के अंधेरों तक बस कुछ अच्छा नहीं लगता.. 

उनके सिवा दुनिया में कोई भी सच्चा नहीं लगता, ना जाने क्यों..


ना जाने कितने ही अल्फ़ाज़ लबों पर आ कर थमने लगते हैं.. 

जब शब्द गुम से हो जाते हैं और नैना बातें करने लगते हैं, ना जाने क्यों ..


ना जाने क्यों लगता है जब उनके साथ होता हूँ तो वक़्त ठहर सा जाए.. 

घड़ी की सुइयाँ रुक जाएँ.. दुनिया वाले कहीं खो जाएँ.. 

बस रह जाएँ तो वो और मैं, ना जाने क्यों.. ना जाने क्यों..


                                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Wednesday, March 8, 2017

Hum Kahan Ja Rahe Hain

साल के 364 दिन ज़ुल्म, और सिर्फ़ 1 दिन सोशल मीडिया पर महिला दिवस का दिखावा — क्या यही है असली सम्मान? समाज की दोहरी सोच पर एक करारा सवाल।


364 दिन महिलाओं पर ज़ुल्म करने वाले लोग,

आज 1 दिन फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर चिल्ला-चिल्ला कर महिला दिवस मना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


बेटियों को मार रहे कोख में, 

और बेटों के पैदा होने पर जश्न मना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


जहाँ एक तरफ साक्षी, सिंधु, साइना, सानिया की जीत का जश्न मना रहे हैं, 

पर अपनी बहू-बेटी के घर से बाहर निकलने में भी ऐतराज़ जता रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,

अपनी बहन को कोई आँख उठा कर देख भी ले तो खून खौल उठता है, 

और दूसरों की माँ-बहनों को एसिड से जला रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


अपने बेटों को इंच भर तकलीफ भी हो तो दर्द होता है, 

पर अपनी ही बहुओं को दिन भर ताने सुना रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


लड़के आधी रात में भी सड़कों पर लड़की छेड़ आएं तो भी शरीफ़ हैं, 

पर लड़की के थोड़े से छोटे कपड़े देख कर उसका कैरेक्टर ढीला बता रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


घरों में सुख-समृद्धि, खुशियाँ लाती हैं औरतें, 

पर चंद रुपयों के लिए उन्हें भी जिंदा जला रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं,


एक पल में झाँसी की रानी तो अगले ही पल में सती सावित्री है औरत, 

अगर मौका मिले तो प्रतिभा पाटिल बन पूरा देश चला सकती है औरत, 

ये सब कुछ जान कर भी जो अंजान बने जा रहे हैं, 

ना जाने हम कहाँ जा रहे हैं, ना जाने हम.....


                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Wednesday, February 1, 2017

Pyaar Kya Hai

प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि माँ का दुलार, भाई-बहन का रिश्ता और सैनिक के इंतज़ार जैसा भी होता है। प्यार की गहरी परिभाषा तलाशती एक कविता।


“प्यार क्या है..?”


प्यार तपस्या और साधना की अनुभूति है,
प्यार समंदर से मिलने वाला मोती है,

प्यार राधा है, रुक्मिणी है, शेषनाग है,
प्यार गोकुल की गलियों में कान्हा का रास है,

प्यार शबरी के बेर और मीरा का विश्वास है,
प्यार कैकेयी के कह देने पर राम का वनवास है,

प्यार माँ का बेटे से दुलार है,
प्यार पिता का दिया अतुलित संसार है,

प्यार भाई की कलाई पर बहन की राखी है,
प्यार गलती न होने पर भी माँगी गई माफ़ी है,

प्यार दादी की बनाई मक्के की रोटी, सरसों का साग है,
प्यार बड़े-बुजुर्गों का दिया आशीर्वाद है,

प्यार देश की सीमा पर लड़ रहे सैनिक के लिए किया इंतज़ार है,
प्यार पत्नी का पति के लिए किया गया श्रृंगार है,

प्यार आँखों ही आँखों में की हुई बातें हैं,
प्यार विरह में बितायी गई लंबी रातें हैं,

प्यार स्त्री के मस्तक पर लगा सिंदूर है, टीका है, लाली है,
प्यार कानों में पहनी हुई बाली है,

प्यार पायल है, बिछिया है, साड़ी है,
प्यार घूँघट में बैठी हुई घराड़ी है,

प्यार छोटी-मोटी नोक-झोंक और मीठी सी लड़ाई है,
प्यार प्रेमिका की गोद में सर रख ली हुई अंगड़ाई है,

प्यार एक दूजे के लिए खाई कसमें हैं, वादे हैं,
प्यार दिलों में जगते नेक इरादे हैं,

प्यार कभी पूर्णिमा तो कभी अमावस की रात है,
प्यार करवाचौथ पर किया हुआ उपवास है,

प्यार जैसे दिया और बाती का साथ है,
प्यार जन्म-जन्म के लिए माँगा हमसफ़र का हाथ है,

प्यार शुरुआत है, प्यार ही अंत है, 

प्यार से ही यह सृष्टि और प्यार ही अनंत है


प्यार जीवन की अनमोल पूँजी है,
प्यार ही तो सफलताओं की कुंजी है।

                                             ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Monday, August 15, 2016

Mera Desh Phir Bhi Chal Raha Hai

आज़ादी के 70 साल बाद भी गुलामी की तरफ बढ़ता देश, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता और गिरती कीमत का डॉलर — फिर भी ज़िंदा है उम्मीद। एक तीखा और ईमानदार सवाल अपने ही देश से।


अपनी ही लगायी चिंगारियों यह जल रहा है,
1947 में आजाद हुआ यह देश 70 साल में ही फिर से गुलामी की ओर चल रहा है,
क्या करे साहब मेरा देश फिर भी चल रहा है ।

Publicity की आड़ में असहनशीलता का ढिंढोरा पिट रहा है,
VVIP सुरक्षा वाला आदमी इस देश में रहने से डर रहा है,
फुटपाथ पर सोता हुआ इंसान भी बड़ी बड़ी गाडियो तले कुचल रहा है,
तो कही गोमाँस खाना लोगो को legal लग रहा है,
क्या करे साहब मेरा देश फिर भी चल रहा है ।

पैसों के लिए जहा देशप्रेम की जगह देशद्रोह का नारा लग रहा है,
एक बच्चे की मौत पर भी जहा कोई वोट बैंक की राजनीती कर रहा है,
और तो और इस देश का नौजवान भी आतंकवादियो को शहीद के रहा है,
इस सब के बाद भी देश का सैनिक वतन की रक्षा के लिए सरहद पर लड़ रहा है,
क्या करे साहब मेरा देश फिर भी चल रहा है ।

Dollar का रेट 70 रुपए तक चढ़ रहा है,
देश का बच्चा मातृभाषा छोड़ अंग्रेजी की तरफ बाद रहा है,
सरकारी मास्टर class में बैठ कर whatsapp कर रहा है,
और दसवीं कक्षा फ़ैल नागरिक भी जहा मंत्री बन रहा है,
क्या करे साहब मेरा देश फिर भी चल रहा है ।

Pak - china आये दिन सीमा में घुस रहा है,
Olympics में भी अब तक अपना प्रदर्शन फुस्स्स रहा है,
Reservation का जहर इस देश को अंदर ही अंदर चूस रहा है,
इस सब के बाद भी अगर आपका खून नहीं खोल रहा है,
तो कोई बात नहीं, साहब मेरा देश तो फिर भी चल रहा है ।

                                                                       ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Sunday, August 16, 2015

Mera Desh Mahan

भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कन्या भ्रूण हत्या के बीच भी क्यों कहते हैं हम "मेरा देश महान"? सच्चाई और व्यंग्य से भरी एक गहरी देशभक्ति कविता।



100 में से 100 बेईमान, फिर भी मेरा देश महान, 

जानकर भी इन बातों को बने हुए हैं सब अंजान, फिर भी मेरा देश महान।


सहती है हर ज़ुल्म मगर कुछ करती नहीं है ये आवाम, 

कहने को तो 1.25 अरब हैं, अंदर से कोई एक नहीं, 

बड़ी-बड़ी इन कुर्सियों पर बैठा कोई भी नेक नहीं, 

भ्रष्टाचार के नाम पर हमें लूट रहे नेता बेईमान, फिर भी मेरा देश महान, 

100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


आतंकी घटनाओं से दहला है पूरा हिंदुस्तान,

 दिल्ली, मुंबई, या हो पुणे, कुछ भी इनसे बचा नहीं, 

होटल हो, बस या ट्रेन, अब तो कुछ भी सुरक्षित बचा नहीं, 

आए दिन हमारी सीमाओं पर घुसते रहते ये शैतान, 

यह जानकर भी चुप बैठे हैं, तो मेरा देश महान, 1

00 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


गलियों में झाँक कर देखा तो आए हैं कुछ ऐसे परिणाम, 

अब भाई, भाई का रहा नहीं, कभी बहनों की इज़्ज़त लूटी है, 

तू इसलिए चिंता में है कि गर्लफ्रेंड तुझसे रूठी है, 

अपने माँ-बाप की सेवा कर, चुका कुछ उनके एहसान, 

तभी बनेगा देश महान, 100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


कोख में मार बच्चियों को बन बैठे हैं कुछ हैवान, 

तुझे कल्पना और सुनीता का चाँद पर जाना दिखा नहीं, 

जिन्हें सानिया और साइना का चैंपियन बनना दिखा नहीं, 

इतना सब कुछ जानकर भी, जो ले रहे बेटी की जान, 

तो भी मेरा देश महान, 100 में से 100 हैं बेईमान, फिर भी मेरा देश महान।


जानकर भी इन बातों को बने हुए हैं सब अंजान, 

फिर भी मेरा देश महान, फिर भी मेरा देश महान, फिर भी मेरा देश महान...!!



                                                                              ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, June 16, 2015

Farewell

पहले दिन जो अजनबी थे, आखिरी दिन जान बन गए। कॉलेज की मस्ती, बंक और दोस्ती को याद करती एक भावुक विदाई कविता।



जब 1st ईयर में मिले थे तब अनजान थे जो, 

आज वही एक-दूसरे की जान हो गए..


कभी सोचते थे 4 लेक्चर तो निकलेंगे कैसे, 

ना जाने कब यहाँ 4 साल पूरे हो गए..


सुख-दुख अच्छा-बुरा सभी में रहे थे साथ, 

क्लास में सभी से करते थे मस्ती-मज़ाक..


लड़ते भी झगड़ते भी, दिन यहीं कटते थे, 

लेक्चर से बंक मार के कैंटीन में मिलते थे..


और आज सोचते हैं क्यों हम इतने बड़े हो गए, 

क्यों फ्यूचर की दौड़ में अपनों से दूर हो गए..


और जब आए थे तब कुछ भी नहीं था हमारे हाथ, 

जाते-जाते यादों की बारात ले गए..


आई है घड़ी जिसे विदाई कहते हैं सभी, 

पर अलविदा कहने को दिल नहीं मानता.... 

अलविदा कहने को दिल नहीं मानता..

        

                                ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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