Tuesday, May 12, 2026

Dard – Dil Ke Dard Par Kavita | Kirtish Shrotriya

दिल का दर्द भी अगर लिखने बैठें, तो शब्द कम पड़ जाते हैं। यह कविता उसी टूटे हुए दिल और बिखरी हुई साँसों की कहानी है, जिसे बयां करना आसान नहीं।

Dard Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya


क्या अपना कोई दर्द लिखूं मैं,

क्या अपने जज़्बात लिखूं।

नस-नस में है चुभते काँटे,

कैसे अपने हालत लिखूँ।


अंतर्मन में जलती ज्वाला,

तन शोलो का संचार करे।

पल पल बढ़ती इस अग्नि को,

कैसे सरिता की धार लिखूँ।


मैत्री के इन वृक्षों पर,

सभी फूल मुरझाये है।

इस उजड़े हुए चमन को मैं,

कैसे बगिया गुलज़ार लिखूँ।


धक धक प्रतिपल चलती धड़कन,

धड़कन में किसका नाम लिखूँ।

इस टूटे हुए हृदय से मैं,

कैसे साँसों का हिसाब लिखूँ।


अपने जीवन को अब कैसे,

अनुपम सहज साकार लिखूँ।

अपनी हृदय वेदना को कैसे मैं,

इस जीवन का आधार लिखूँ।


                            ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, May 5, 2026

Wo Jo Dikha Nahi Hai – Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

जिसे देखे बरसों बीत गए, फिर भी दिल हर पल उसी की एक झलक ढूंढता है। दूरी की तड़प और इश्क़ की गवाही देती एक गहरी ग़ज़ल।

Wo Jo Dikha Nahi Hai Hindi Ghazal by Kirtish Shrotriya

वो जो दिखा नहीं है कई जमाने से।

कोई मिला दो उस चाँद को इस परवाने से।


रुपया, ज़मीन, जायदाद जो भी है सब ले जाओ।

बस दिखा दो उसकी एक झलक किसी बहाने से।


कितना है, कैसा है, क्यों है, उनसे इश्क़ ये ना पूछो।

चाहतो की बातो को, तोला नही करते किसी पैमाने से।


वो कसमें, वो वादे, वो बाते उनकी।

अब धुन्दला गयी है दिन के आशियाने से।


इश्क है उनसे ये कहा था, कहा है, कहेंगे हर दिन।

मोहब्बत करने वाले डरते नहीं ज़माने से।


दीदार-ए-यार को तड़पे है बहुत ज़मानों से।

उनसे कहना एक बार तो आ कर मिल ले अपने दीवाने से।


                                                               ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 28, 2026

Mradu Kar – Shuddh Hindi Ishq Ghazal | Kirtish Shrotriya

क्या मोहब्बत की एक हल्की सी छुअन भी पूरी कायनात को हिला सकती है? शुद्ध हिंदी में गुंथी यह नाज़ुक ग़ज़ल इश्क़ के उसी नर्म, जादुई एहसास को शब्दों में पिरोती है।

Mradu Kar Hindi Ghazal by Kirtish Shrotriya


अपने म्रदु कर से जब पुष्पों को, शाख से तोड़ती होगी।

तो शाख़ें भी, खुशी में फिर, भवँर को चूमती होगी।


साँस ले कर के जो अपनी, हवाओं को भी महका दे,

हवा भी रोब में तनकर, गगन में घूमती होगी।


नरम पैरों से अपने जब, पानी नहरों का सहला दे,

तो नहरें भी, ख़ुद को दरिया, समझ कर झूमती होगी।


जो गा कर इश्क़ का गाना, सरगमें कोई छेड़ दे,

तो सरगम भी मौज़ में, धुन नई सी बुनती होगी।


सुर्ख होठों से अपने जो, कभी कोई नज़्म कह दे तो।

नज़्म भी रूप गज़लों का, शौक से चुनती होगी।


                                                        ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 21, 2026

Kaun Ho Tum – Romantic Kavita | Kirtish Shrotriya

चुपके से दिल में दस्तक दे कर नींदें उड़ा देने वाला वो कौन है — कोई ख्वाब, कोई दुआ या कोई रोशनी? एक दिलचस्प और रूमानी सवाल पूछती यह कविता।

Kaun Ho Tum Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya


यूँ चुपके से दिल मे कर गए दस्तक,

ज़रा बताओ तो कौन हो तुम,


है यह आँखों का धोका कोई,

या झूठा सा कोई ख्वाब हो तुम,


है यह बिन माँगी सी मन्नत कोई,

या अलादीन का खोया चिराग़ हो तुम,


है यह बुजुर्गों का दिया आशीर्वाद कोई,

या इस ज़िद्दी दिल की अरदास हो तुम


है यह जाम से छलका कतरा कोई,

या मैक़दे की पूरी शराब हो तुम,


है यह चाँद सी शीतल किरणे कोई,

या रोशनी से भरा आफताब हो तुम,


ज़हन में उतर मेरे, नींदे भी छीन ली मुझसे,

सच कहूं, हां सच कहूं तो बहुत खराब हो तुम।


                                                    ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, April 14, 2026

Naa Jaane Kaun Hai Wo – Khwabon Ki Kavita | Kirtish Shrotriya

एक चेहरा जो रोज़ सपनों में आता है, ना नाम बताता है, ना पता — फिर भी दिल में गहरी दस्तक दे जाता है। ख़्वाबों में बसे एक अनजान इश्क़ की कविता।

Naa Jaane Kaun Hai Wo Hindi Kavita by Kirtish Shrotriya

ढलती हुई शामों में, शबनम सी बिख़र जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


ना कभी नाम कहा उसने, ना अपना पता बताती है।

ना कभी नाराज़ हुई मुझसे, ना कभी गुस्सा जताती है।


ना कभी कुछ माँगा उसने, ना कभी अपना हक जताती है।

ना कभी सताया मुझको, ना कभी मेरा दिल जलाती है।


मेरे हर सवाल के जवाब में, वो कुछ यूँ नज़रें झुकाती है।

बिन कुछ कहे भी उनकी नज़र, बहुत कुछ कह जाती है।

 

ख़्वाबों में उन्हें देखते हुए, सहर से दोपहर हो जाती है।

कम्बख़्त यही एक वज़ह है, की हमें नींद बहुत आती है।


फिर भी वो हर रात, इस दिल को नई आरज़ू दे जाती है।

ना जाने कौन है वो, जो हर रोज़ मेरे सपने में आती है।


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Thursday, December 31, 2020

Thankyou 2020 – Saal Ka Dhanyawad | Kirtish Shrotriya

एक ऐसा साल जिसने डराया भी और सिखाया भी — क्या मुश्किल वक़्त भी कभी शुक्रिया कहने लायक हो सकता है? 2020 को दिया गया एक भावुक धन्यवाद।


शुक्रिया-ए-2020 जिंदगी की कीमत समझाने के लिए।

शुक्रिया-ए-2020 जीने का सही मतलब समझाने के लिए।


हाँ माना तुम थोड़े ज्यादा निर्दयी, निष्ठुर और क्रूर थे।

पर हमे जीवन के सही मायने सिखाने को मजबूर थे।


इस बात को बताया तुमने की हम अब तक कितने भ्रम में थे।

अभी जीने को बहुत लंबी जिंदगी है इस वहम में थे।


जब चार दिवारी में बैठ कर कुछ महीने बिताने लगे।

अपनों के साथ रहने की ख़ुशी तभी समझ पाने लगे।


शुद्ध और ताज़ी हवा से हमे रूबरू भी कराया तुमने।

हमने पर्यावरण बर्बाद कर रखा था, महसूस भी कराया तुमने।


तुमने यह भी समझाया कि हम कम में भी गुजारा कर सकते है।

फ़िज़ूल के दिखावें से अच्छा तो किसी इंसा का पेट भर सकते है।


हमारे अंदर छुपी कलाओं को निखारा है तुमने।

कही शेफ़, कही सिंगर, तो कही पेंटर निकाला है तुमने।


रामायण महाभारत का इतिहास फिर से दिखाया है तुमने।

होली से न्यू ईयर तक सारे त्यौहारों को घर पर मनवाया है तुमने।


छोटी छोटी खुशियों की हमें अहमियत समझाने के लिए।

लॉक डाउन के बहाने ही अपनों के साथ थोड़ा वक्त दिलाने के लिए।


शुक्रिया-ए-2020, हमारी जिंदगी में आने के लिए।

शुक्रिया-ए-2020 जिंदगी की कीमत समझाने के लिए।


                                                           ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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Tuesday, July 14, 2020

Neta Bikta Hai – Political Satire | Kirtish Shrotriya

सत्ता की कुर्सी के लिए कब तक बिकते रहेंगे नेता? भारतीय राजनीति की सच्चाई पर करारा तंज़ करती एक तीखी कविता।



सत्ताए बदली है सारी राजनीति की संधि में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


भ्रष्टाचार कर कर के इन्होंने, जाने कितना कमा लिया।

घूसखोरी का सारा पैसा, दो नंबर में लगा दिया।

इनको कभी नहीं है परवाह, देश चले चाहे मंदी में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


कभी इधर कभी उधर कूदते, टेबल टेनिस बना दिया।

देश का फ्यूचर अधर में लटका, खुद का फ्यूचर बना लिया।

कितना ही रख लो इनको तुम, 5 स्टार की पाबंदी में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


एक पार्टी से लूट लिया, अब दुजी पार्टी की बारी है।

हर बार इन्होने दिखलाया, की इनको लक्ष्मी प्यारी है।

इनको सिर्फ चाहिए पैसा, गर्मी हो या ठंडी में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


भला बुरा सब भूल गए, सब अपने पराए भूल गए।

सत्ता कुर्सी के मोह में पड़, सारे उसूल भी भूल गए।

कल के आए बन गए मंत्री, अपने रह गए रज़ामंदी में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


सत्ताए बदली है सारी राजनीति की संधि में।

हर नेता बिकता है प्यारे लोकतंत्र की मंडी में।।


                                              ~ किर्तिश श्रोत्रिय




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